मेरे अध्यात्मिक अनुभव !

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daniel


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NO MATTER !!!

Posted On: 19 Oct, 2013  
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मनुष्य, पशु और मनुष्य की पशुता

Posted On: 25 Jun, 2012  
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चिंतामुक्त, निरोगी व् आनंदपूर्ण जीवन जियें!

Posted On: 11 Apr, 2011  
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चमत्कारिक निशुल्क औषधि: Healing Drops

Posted On: 13 Nov, 2010  
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क्षमा प्रार्थना !

Posted On: 11 Nov, 2010  
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आपदा प्रबंधन :बिना भोजन पानी जीवित रहने के उपाय !!

Posted On: 19 Oct, 2010  
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हे प्रभु ! मै आपका धन्यवाद करता हूँ………

Posted On: 12 Oct, 2010  
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ईश्वर के प्रति कृतज्ञता व् धन्यवाद का महत्व !!!

Posted On: 11 Oct, 2010  
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के द्वारा:

मान्यवर मैं भी डैनियल जी की बातों से सहमत नहीं हूँ, लेकिन आपका विरोध  करने का ये तरीका भारतीय या हिन्दु वादी नहीं है यह या अरब देशों से आये लुटेरों का है  या यूरोप से आये क्रिसचनों का।  मेसा मनना है कि ईश्वर एक  मानवीय कल्पना है, निर्धनों  एवों दलितों का शोषण  करने का माध्यम  है। ईश्वर की अनुपलब्धता एवं अशुभ की उत्पति सिद्ध  करती है कि ईश्वर नहीं है। हम ईश्वर के विषय में कुछ नहीं जानते और न ही जान सकते हैं। अतः यह निश्चुत पूर्वक नहीं कह सकते कि ईश्वर की सत्ता है या नहीं। प्रमाणों और तर्कों के आधार पर उसके अस्तित्व को प्रमाणित या अप्रमाणित नहीं किया जा सकता।अशुभ की समस्या के आधार पर उस ईश्वर को पूर्णतः अस्वीकार किया जा सकता है, जिसकी कल्पना ईश्वरवादियों ने की है। अपने समस्त गुणों को ईश्वर में प्रत्यारोपित करके मनुष्य स्वयं ही ईश्वर के प्रत्यय की रचना करता है, अतः ईश्वर वास्तव में मनुष्य की मानसिक कल्पना है। मानवीय ज्ञान और वैज्ञानिक दृष्टकोण की तीन अवस्थायें हैं-१.ईश्वर परक- यह प्रथम तथा निम्न अवस्था है। जिसे मानव का शैशवकाल कह सकते हैं। इस अवस्था में मनुष्य इन्द्रियातीत सत्ताओं तथा शक्तियों में पूर्णतः विश्वास करता है। बालक की तरह प्रत्येक प्राकृतिक घटना का अनुभवातीत देवीय पुरुष में ही ढ़ूढ़ता है। अनुभवातीत देवीय शक्तियों एवं उनमे विश्वास करने वाले गुरुओं का अधिक महत्व होता है। व्यक्ति और समाज दोनों को इस अवस्था से गुजरना पड़ता है। २.तात्विक- देवीय शक्तियों का महत्तव समाप्त कर उनके स्थान पर मनुष्य नैर्वेयक्तिक अमूर्त शक्ति को ही प्रत्येक प्राकृतिक घटना का हेतु मानता है। ३.प्रत्यक्षवादी- यह ज्ञान के विकास की सर्वोच्च अवस्था है। मनुष्य दैवीय तथा अमूर्त शक्तियों का परित्याग करता है। अपने अनुभव तथा प्रेरक्ष को ही ज्ञान का आधार बनाता है तथा सर्वव्यापी प्राकृतिक को खोजता है। प्रत्येक समस्या पर वैज्ञानिक दृष्टिकोण से विचार करता है। विज्ञान को महत्ता प्राप्त होती है। ईश्वर पर निर्भर होकर मनुष्य अपनी शक्ति को भूल बैठता है। ईश्वर के हनन से ही मानवीय महत्व को समझने का प्रयास हो सकता है। बुद्धि से स्वार्थ भावना के साथ साथ मृत्यु और असफलता की आशंका भी जन्म लेती है। अपने अहम् भाव के सृजित होने के कारण, विनाश के संभावना की चिंता तथा कर्मों की असफलता की संभावना से उदिग्न होने के कारण बुद्धि प्रतिकार करके, नैतिकता की संभावना बनाती है। उसके उपाय स्वरूप कपोल कल्पनाओं द्वारा धर्म का उदय होता है। पहली कपोल कल्पना से अलौकिक तथा देवीय अस्तित्व कायम कर, उसकी स्वार्थ परता पर दण्ड की संभावना से नियंत्रित करता है। समाज विरोधी कर्मों पर अंकुश लगाने से समाज व्यवस्थित होता है। दुसरी कपोल कल्पना से आत्मा की अमरता के कारण, मृत्यु की आशंका से मुक्त होता है। तीसरी कपोल कल्पना से, सर्वशक्तिमान दयालु ईश्वर एवं उसकी आराधना के विधान से कठिनाई के समय सहायता द्वारा असफलता की आशंका से मुक्ति होती है। ईश्वर का भाव मनुष्य के द्वारा आत्म चेतना के विकास के क्रम में निर्मित भाव है। अपने अस्तित्व की चेतना में व्यक्ति का अन्य व्यक्तियों की, दृष्टि को दूसरों द्वारा देखे जाने की चेतना होती है। कभी कभी व्यक्ति इन मानवीय संबंधों से अलग हो, अन्य अपने से इतर की उपस्थिति के मूल में जाने की चेष्टा करता है। वह जानना चाहता है कि क्या कोई ऐसी चेतना भी है, जो किसी अन्य की दृष्टि का विषय नहीं है, जो शुद्ध चेष्टा भाव है। इसी क्रम में वह ईश्वर भाव की सृष्टि कर लेता है। स्पष्ट है कि यह भाव अवास्तविक ही है। ईश्वर तथा आत्मा संबंधी किसी भी प्रकार का विज्ञान संभव नहीं है तथा आत्मा का भी कोई अस्तित्व नहीं है। आदि काल में मनुष्य प्राकृतिक नियमों से अनभिज्ञ था तथा अनेक प्रकार की प्राकृतिक विपत्तियों के फलस्वरूप सदैव असुरक्षित तथा भय के कारण मानव-समाज में धर्म का जन्म हुआ। सपनों, परछाइयों और प्रतिबिम्बों की व्याख्या के लिये आदिम मानव मे अपने शरीर से प्रथक आत्मा में मिथ्या विश्वास रचा और धारणा बनाई कि मनुष्य के दो भाग हैं। एक दृश्य शरीर है जो सदा परिवर्तित होता रहता है और दूसरी अदृश्य आत्मा है जो बदलती नहीं। इसके बाद यह विचार पनपा कि आत्मा का नित्य अस्तित्व है और उसे देवी देवता और ईश्वर का नाम दिया है। उन देवी देवताओं और ईश्वर के ऊपर मानव स्वभाव का आरोप कर दिया। यह ईश्वर मनुष्य के समान घृणा करने और बदला लेने वाला बन गया।

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

जयचन्द और मीरजाफर की लिस्ट में एक और नाम होगा शातिर अन्ना हजारे। प्रदर्शन कारियों को संबोधित करते हुए दारा सेना के अध्यक्ष श्री मुकेश जैन ने देश वासियों को अन्ना की देश को अस्थिर करने की साजिश से सावधान रहने की अपील करते हुए कहा कि कल देश अमेरीका का गुलाम होता है तो जयचन्द और मीरजाफर की लिस्ट में एक और नाम होगा शातिर अन्ना हजारे। श्री मुकेश जैन ने भाजपा नेता एम वेंकैया नायडू की आलोचना करते हुए कहा कि शातिर अन्ना के साथ जुड़े अग्निवेश,पी वी राजगोपाल और अखिल गोगई जैसे देश के दुश्मन आतंकवादी शायद भाजपा नेता वेंकैया नायडू जानबूझ कर नहीं देख रहे हैं। उन्हें मालूम होना चाहिये कि अग्निवेश को उन्हीं की छत्तीसगढ़ सरकार ने कट्टर नक्सली आतंकवादी सबूतों के साथ बताया।अखिल गोगई के बारे में असम सरकार के मुख्य मंत्री तरूण गोगई का कहना है कि यह उल्फा का कट्टर आतंकवादी हैं। मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री दिग्विजय सिंह के अनुसार पी वी राजगोपाल नक्सली आतंकवादी है।इस नक्सली ईसाई आतंकवादी की पत्नि कनाड़ा की ईसाई है। पति पत्नि दोनों को आतंकवादी अंगेज मिश्निरियों का आर्शीवाद प्राप्त है।नक्सली इसाई आतंकवादी पी वी राजगोपाल अपने 25000 नक्सली ईसाई आतंकवादियों को लेकर 4 साल पहले दिल्ली में आने की रिहर्सल भी कर चुका है। इन आतंकवादी गिरोहों को अन्तरराष्ट्रीय और अमेरीकी चर्च मदद करते हैं ये भी भारत सरकार ने 10 दिसम्बर 96 और 5 मई 1954 को संसद के बताया था।

के द्वारा:

प्रिय भाई डैनियल, वंदेमातरम ! आपकी पिछली पोस्ट पर ” चिंतामुक्त, निरोगी व् आनंदपूर्ण जीवन जियें! “ पर हुये वाद विवाद का मूल कारण था सेमेटिक धर्मों द्वारा भारत में पिछली कई सदियों में किया गया धर्मपरिवर्तन । धर्मपरिवर्तन, देशपरिवर्तन होता है, इसके पक्ष में मैंने आपके सामने कई तर्क रखे थे । इसके अलावा भारत के तमाम महापुरूषों (गांधी, स्वामी विवेकानंद, दयानंद सरस्वती आदि) ने भी चर्च द्वारा गरीब, अशिक्षित भारतीयों का पैसे के बल पर और तमाम फर्जी उदाहरणों और भ्रष्ट तरीकों से भारत की हजारों साल पुरानी सभ्यता और संस्कृति को झुठलाते हुये किये गये धर्मपरिवर्तन को धिक्कारा है । इसके पक्ष में मैंने और श्री अश्विनी जी ने आपके समक्ष तमाम उदाहरण और तर्क रखे । चर्च ईसाई बनाने के लिये पूरे विश्व में क्या क्या हथकण्डे अपना रहा है और उसमें व्याप्त भ्रष्टाचार के बारे में भी हम लोगों ने तथ्य रखे । इसके अलावा मैंने आपके समक्ष कुछ प्रश्न भी रखे । उन प्रश्नों के उत्तर आपने नहीं दिये । इसलिये नहीं दिये क्योंकि उत्तर वहीं हैं जो हमने विस्तार से टिप्पणियों में रखा है । . हॉं, मैं छद्म नाम से टिप्पणी और अशिष्ट भाषा को वर्चुअल वल्ड में गलत मानता हूं । एक छद्म नाम से की गयी टिप्पणी ने आपको बहुत आहत किया, जिसके उत्तर में आपने लिखा ”तब आप मुझे क्रूस पर कब चढ़ा रहे हैं ।“ आपकी इस पंक्ति से मुझे भी अपार कष्ट हुआ । आप चाहे जितना कहें कि आप राग, द्वेष, मान, अपमान से ऊपर उठ गये हैं लेकिन आपकी इस टिप्पणी से लगा कि आप कुछ क्षणों के लिये विचलित जरूर हो गये थे । आपको कष्ट हुआ मुझे इसका दुख है । हॉं, जब आपने मुझ पर ब्राह्मणवादी होने का आरोप लगाया तो इससे मुझे कोयी फर्क नहीं पड़ा क्योंकि मैं जो हूं वह हूं, किसी के कहने भर से मैं वह नहीं हो जाऊंगा, फिर इसका मैंने बुरा भी नहीं माना क्योंकि मैं जान गया कि आपके पास मेरे द्वारा उठाये गये प्रश्नों के उत्तर नहीं थे इसलिये आप जातिवाद पर उतर आये थे । . मित्र, भारत के संविधान ने अपने सभी नागरिकों को किसी भी धर्म को मानने की, आस्था, विश्वास, उपासना की स्वतंत्रता दी है । यह तत्व भारत की संस्कृति में हजारों साल से विद्यमान रहा है और सन 1950 में जिसे भारत के संविधान ने मूर्त रूप दिया । अगर यह तत्व हमारी संस्कृति में विद्यमान न होता तो न बौद्ध, जैन, सिख, पारसी, मुस्लिम, ईसाई, याहूदी आदि तमाम धर्मों को मानने वाले भी भारत में न होते । वास्कोडिगामा और उसके पहले और बाद में आने वाले कितने ईसाईयों को भारत में न सिर्फ बसने दिया गया और बल्कि चर्च के लिये जमीनें भी दी गयीं । ईश्वर तत्व के बारे में हमारे यहां पिछले 8 हजार साल पहले ही बहुत कुछ कहा और लिखा गया । ईश्वर जो कि पूरी सृष्टि का मूल है और एक वही परमतत्व है यह सनातनधर्म ने बहुत पहले ही जान लिया था और निसंदेह यह ज्ञान यहीं से पूरे विश्व में फैला । जब सारे रास्ते उसी एक परमतत्व तक जाते हैं तब इसमें कौन सी लड़ाई । आप कोयी भी रास्ता अपनाने के लिये स्वतंत्र है और इसीकारण भारत में हजारों साल से धर्म की स्वतंत्रता रही है । . लेकिन मित्र जो मैंने बार बार कहा है कि मध्ययुगीन विश्वइतिहास उठा कर देखें । धर्म विश्वराजनीति के मूल में आ गया था । एक तरफ भारत में जहॉं सनातन धर्म के साथ साथ बौद्ध, और जैन धर्म पुष्पित पल्लवित हुए वहीं मध्यपूर्व में भी याहूदी से ईसाई धर्म और इस्लाम निकला । जहॉं भारत में धर्म को लेकर (पिछला 2500 साल का इतिहास देखें) कोयी युद्ध नहीं लड़ा गया और अशोक जैसा शांतिदूत सम्राट पैदा हुआ वहीं सेमेटिक धर्म आपस में दो शाताब्दियों तक विश्वविजय के लिये क्रूसेड जैसा युद्ध लड़ते रहे । सेमेटिक धर्मों ने भारत में कितना अत्याचार किया है उसे लाख छिपाया जाये लेकिन सन 1947 के पहले लिखा गया साहित्य उसे उजागर कर देता है । आधुनिक युग में समेटिक धर्मों के प्रचार प्रसार के लिये अब तलवार की जगह ले ली है लवजिहाद और डॉलर ने । क्रूसेड तो अभी भी लड़ा जा रहा है इराक, अगानिस्तान, लीबिया जैसे देशों में । . सेमेटिक धर्म पूरे विश्व पर अपना राज्य स्थापित करना चाहते हैं । आज पश्चिम मुसलमानों की बढ़ती जनसंख्या से बुरी तरह हिला हुआ है । पोप खुले आम दुख प्रकट करते है कि ईयाईयों की जनसंख्या वृद्धि नहीं हो रही है और कुछ समय बाद यूरोप और अमेरिका में मुसलमान बहुसंख्यक हो जायेंगे । सेमेटिक धर्मों के लिये हिंदू जाति आज भी सबसे बड़ी शिकार है । हिंदुओं का धर्म के प्रति लचीला रूख उनको सदैव आकर्षित करता है धर्मपरिर्वतन के लिये । जहॉं मैं एक और ईश्वर की सत्ता को मानता हूं वहीं दूसरी तरफ सेमेटिक धर्मों के आक्रमक रूख से भी चिंतित हूं क्योंकि मित्र इतिहास की हजारों किलोमीटर लंबी सड़क पर आजादी के बाद मात्र 63 कदम हम चले हैं और मात्र सेमेटिक धर्मों के कारण ही देश का बंटवार देखा, जलता हुआ कश्मीर देखा और आज मिशनरियों द्वारा नक्सलियों और पूर्वोत्तर के आंतकी समूहों को हर साल अरबों डॉलर का चंदा भी देख रहा हूं । वेटिकन पूरी दुनिया में धार्मिक चंदे के नाम पर हिंसा फैलाने में लगा हुआ है । कुछ उदाहरण हमने आपके सामने रखे थे । इस पर आपने चुनौती भरे स्वर में कहा कि ईसाईयत के बढ़ते कदमों को हम लाख कोशिश कर ले पर रोक नहीं सकेंगे । आपने अपने तर्क में कई मिशनरी संस्थाओं की वेबसाइट भी दी जो हर साल भारत में चर्चों की अनगिनत संख्या बढ़ाते जा रहे हैं । . मित्र कुछ प्रश्न मैंने शुरूआत में ही आपसे पूछे थे । जैसे कि धर्मपरिर्वतन से किसी देश पर क्या नकारात्मक प्रभाव पड़ता है ? क्या कोयी एक धर्म सबसे अच्छा हो सकता है ? क्या धर्म राष्ट्रधर्म से बढ़ कर होता है ? जब ईसाईयत में इतनी ताकत नहीं कि वे भारत में ईसाई बने लोगों के जीवन और बौद्धिक स्तर को उठा सकें (क्योंकि अब उन्होंने दलित इसाईयों के लिये आरक्षण की मांग रख दी है जबकि संविधान में आरक्षण धार्मिक आधार पर देने पर प्रतिबंध है) तब भारत कें करोड़ों गरीब और अशिक्षित, भाले भाले लोगों को आपने क्यों ईसाई बना दिया ? . मित्र इन प्रश्नों के उत्तर अभी भी आपने नहीं दिये हैं । आपसे अनुरोध करूंगा कि कृपया धर्म से ऊपर उठ कर राष्ट्रधर्म का पालन करें और भारत देश के और विभाजन में सहभागी न बनें । . आपका के एम मिश्र ।

के द्वारा:

परम स्नेही मित्र डेनियल जी ,,सुप्रभात ,,आप का कथन है की हममे इतनी अधिक उर्जा है तो स्नेही मित्र यह ऊर्जा हर उस सच्चे भारी भारतीय के पास है तभी तो भारतीय संस्कृति आज तक इतने दुर्दांत आक्रमणों सांस्कृतिक स्न्क्रम्नों के बावजूद खुद को अक्छुणय रहे हुए है क्या इतिहाश में कोइ ऐसी संस्कृति आपको मिलेगी ?,,पता नही कितनी संस्कृतियाँ आयीं और उनका नामोनिशान मिट गया ,,यह भारतीय संस्कृति की महानता को ही दर्शाता है जो हर विषम परिस्थिति से उबरकर सोने की तरह निखरकर सामने आयी है ,, और जहां तक मिशनरीज के चर्चा की बात है तो उसके लिए भी आप ने ही बाध्य किया ,,अन्यथा मुझे आवश्यकता नही है किसी मिशनरी के सिंहावलोकन की ,, प्रिय मित्र मे पुनः आपसे विनम्र निवेदन करता हूँ की बहुत से वस्तुएं /विचार सार्वजनिक नही किये जाते,,यथा आप अपनी पत्नी से बहुत अधिक प्यार करते हैं अपने पुत्र से प्यार करते हैं अपने माता पिता से प्यार करते हैं,यह आपका व्यक्तिगत अनुभव है जो आपको आनन्दित करता है लेकिन जब आप इसे सार्वजनिक मंच पर रखते हैं तो अपनी निजता का अपने ही हाथों अंत कर देते हैं,,क्या यह उचित है ? प्रिय मित्र यह सार्वजनिक मंच है व्यक्तिगत नही अतः निजता को खुद तक ही रखना बेहतर होगा ,,यहाँ पर देश हित देश प्रेम अनेकों समसामयिक मुद्दे हैं परिचर्चा के लिए जिस पर लिखकर देश हित में आप अपना अमूल्य योगदान भी कर सकते हैं ,,इसी मंच पर न जाने कितने विभिन्न धर्मों के साधक हैं लेकिन उन्होंने अपनी साधना /अनुभवों को सार्वजनिक करना उचित नही समझा क्यों ? यह सार्वजनिक मंच है मात्र इसलिए,, आप अपने आराध्य को जमीन पर फेंक कर लोगों से यह अपेक्छा करें की कोइ उस पर अपना पाँव न रक्खे तो क्या यह उचित है आप स्वयं ही विचार करें ,,परमपिता परमात्मा आपको सद्मार्ग की तरफ प्रेरित करे इसी कामना के साथ ...जय भारत

के द्वारा:

प्रिय डेनियल जी……तिरूअनंतपुरम, 1 सितम्बर। चर्च के पादरियों की एक चौंकानेवाली सच्चाई सबके सामने आई है। केरल के कैथोलिक चर्च के पूर्व पादरी ने अपनी किताब में खुलासा किया है कि चर्च के अधिकतर पादरी और अन्य विश्पासपात्र व्यक्ति भी अवैध सेक्स संबंधों में लिप्त रहते हैं। केरल के विसेंशियन कॉन्ग्रिगेशन चर्च के पूर्व पादरी के. पी. शिबु ने अपनी आत्मकथा च्च्हियर इज द हार्ट ऑफ ए प्रीस्टज्ज् में चर्च के पादरियों द्वारा ननों और समुदाय के अन्य लोगों के यौन शोषण का खुलासा किया है। उन्होंने बताया है कि चर्च के पादरी व्यभिचारी और पक्षपातपूर्ण जिंदगी जीते हैं। शिबु ने ?से चरित्र वाले पादरियों की जमकर आलोचना भी की है। 11 साल तक पादरी रह चुके शिबु लिखते हैं कि समलैंगिकता और ब्लू फिल्मों को चलाना चर्च के पादरियो के जीवन का हिस्सा बन गया है। पादरियों और ननों का एक तबका वासना और पैसे की चाह में इस गोरखधंधे में लिप्त है। यही नहीं चर्च द्वारा चलाए जा रहे एजूकेशनल इंस्टीट्यूट में भी भारी वित्तीय गड़बडियां होती रहती हैं। शिबु ने दावा किया है कि उन्होंने जितने भी पादरियों को सुना है, देखा है उसके आधार पर कह सकते हैं कि लगभग 60 प्रतिशत पादरियों ने चर्च की ननों, विधवाओं, आदि महिलाओं के साथ अवैध यौन संबंध बनाए हैं। अधिकतर मामलों मे पादरी उनकी गरीबी, मजबूरी या उनके अनाथ होने का फायदा उठाकर उनके साथ सेक्स संबंध बनाते हैं। शिबु ने दावा किया है कि चर्च मे आने वाले नए पादरियों का भी रैगिंग की तरह शोषण किया जाता है। उल्लेखनीय है कि इससे पहले भी सिस्टर जेसमिन ने अपनी किताब च्च्अमेन: ऑटोबायोग्राफी ऑफ ए ननज्ज् में चर्च के अंदर होने वाले काले कारनामों का खुलासा किया था। इस किताब में भी चर्च के पादरियों पर जबरदस्ती शारीरिक संबंध बनाने का दबाव डालने के आरोप लगाए गए थे।……..जय भारत

के द्वारा:

प्रिय डेनियल जी :-विवेकानंद और गांधी तो स्वयं भुक्तभोगी थे| विवेकानंद को मिश्नरियों ने कॉफी में जहर देने की कोशिश की थी और गांधी के गले की माला को एक मिश्नरी ने तोड़ दिया था| पूरे एक हजार साल तक यूरोप में पोप-लीला चलती रही| वह धर्म नहीं, शुद्घ राजनीति थी| यूरोप के राजा-महाराजाओं को पोप सीधी टक्कर देता था| एक म्यान में दो तलवारें रहती थी ? यह काल यूरोप का अंधकार-काल कहलाता है| यदि मार्टिन लूथर का अवतरण नहीं होता और वोट्टनबर्ग के चर्च पर वे सिंहनाद नहीं करते तो सारी दुनिया के चर्च तत्कालीन यूरोप की तरह आज भी व्याभिचार, रिश्वत, अपराध और दुराचार के अड्रडे बने रहते| एशिया में जन्मे महान संत ईसा रोमन तिकड़कियों के हाथ में फंसकर कैसी दुर्गति को प्राप्त हुए ? क्या हमारे ईसाई, जो दुनिया के किन्हीं भी ईसाइयों से कमतर नहीं हैं, ईसा का उद्घार नहीं करेंगे ? उन्हें चाहिए कि पैसे, डंडे और कपट के दम पर धर्मांतरण करनेवाले पादरियों को वे भारत से निकाल बाहर करें| गाँधी से बड़ा असांप्रदायिक व्यक्ति कौन था ?((((((( यदि गांधी ने धर्मातरण की निंदा की और उसे अनैतिक कहा तो उस समय के हमारे राष्ट्रवादी ईसाइयों ने उनका स्पष्ट समर्थन किया|))))))))) उस समय मिश्नरी गतिविधियों का मुख्य लक्ष्य लोगों को अंग्रेज-भक्त बनाना था| स्वाधीनता-संग्राम के दिनों में मिश्नरी गतिविधियाँ बि्रटिश सामा्रज्य की अवैध संतान बनकर भारत की छाती पर लदी थीं|((((((((क्या वजह है कि मिश्नरीगण सिर्फ आदिवासियों और अनुसूचितों के बीच काम करते है ? इसलिए कि पढ़े-लिखे और समर्थ लोगों के बीच उनकी दाल नहीं गलती| गरीब और अशिक्षित लोगों को शिक्षा चिकित्सा या नौकरी का लालच देकर व उनका धर्म हर लेते हैं| क्या यह धर्मांतरण है? यह शुद्व धोखाधड़ी है| नैतिक अपराध है| यदि कोई ईसा के व्यक्तित्व पर रीझ जाए और बाइबिल पढ़कर मोक्ष का रास्ता पा ले तो उसका ईसाई बनना तो समझ में आता है लेकिन भोले लोगों को ईसाई बनाने के नाम पर मिश्नरीगण उन्हें ऐसे पापों में डुबोने का काम करते हैं| जिनसे तारने का वादा ईसा जिदंगीभर करते रहे| इसीलिए जो सच्चे ईसाई हैं और शुद्व धार्मिक-अध्यात्मिक व्यक्ति हैं, उन्हें तथाकथित धर्मांतरण के विरूद्घ वैसा ही शंखानद करना चाहिए, जैसा कभी दयानंदद्व विवेकानंद और महात्मा गांधी ने किया था|आज भी भारत के मिश्नरी अपना काम-काज विदेशी धन से चलाते हैं | वे अमेरिकी और यूरोपीय ईसाई संगठनों के प्रति जवाबदेह हैं| यह कहना कठिन है कि उन्हें कौन ज्यादा पि्रय है, बाइबिल के सिद्घांत या विदेशी धन ? अमेरिका और यूरोपीय गुप्त दस्तावेजों के संग्रहालय अब धीरे-धीरे खुल रहे हैं| उनसे भी मालूम पड़ेगा कि इन देशों ने धर्म के नाम पर हमारे ईसाई मिश्नरियों का कैसा बेजा इस्तेमाल किया है| मिश्नरियों की आपत्तिजनक गतिविधियों के कारण ही कई राज्यों में धर्मांतरण-विरोधी विधेयक पारित हुए हैं| आश्चर्य है कि इन विधेयकों का जबर्दस्त इस्तेमाल क्यों नहीं होता ?........……..जय भारत

के द्वारा:

प्रिय डेनियल जी.......नई दिल्ली। क्रिसमस की पूर्व संध्या पर दलित इसाई संगठन ‘पुअर क्रिश्चियन लिबरेशन मूवमेंट’ ने भारतीय चर्च से ‘धर्मांतरित इसाइयों’ के प्रति किए गए ‘विश्वासघात’ के लिए मुआवजा मांगा है। संगठन ने चर्च नेतृत्व से ‘धर्मांतरित इसाइयों’ की स्थिति पर ‘श्वेत-पत्र’ रखने की मांग भी की है। मूवमेंट के राष्ट्रीय अध्यक्ष आर.एल.फ्रांसिस ने कहा कि विगत कुछ समय से ‘रंगनाथ मिश्र आयोग की रिपोर्ट’ पर देश-भर में चर्चा हो रही है। रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि धर्मांतरण के बावजूद ‘ईसाईयत’ ग्रहण करने वाले वंचितों की स्थिति में कोई सुधार नही हुआ है। सच तो यह है कि चर्च अपने ही ढांचे में ‘धर्मांतरित ईसाईयों’ के साथ न्याय नही कर सका है। 70 प्रतिशत से ज्यादा आबादी होने के बावजूद ‘धर्मांतरित इसाई’ यहाँ जातिवाद, भेदभाव, उत्पीड़न और शोषण का शिकार है। ‘पुअर क्रिश्चियन लिबरेशन मूवमेंट’ के अध्यक्ष आर.एल.फ्रांसिस ने अफसोस जताया कि चर्चो का नेतृत्व ‘धर्मांतरित इसाइयों’ को अपने ढांचे में सम्मान देने एवं उनका विकास करने की अपेक्षा उन्हें हिन्दू दलितों की सूची में शामिल करवाने के लिए लालायित है जबकि करोड़ों दलितों ने हिन्दू दलितो को मिलने वाली सुविधाओं का त्याग कर ‘आत्मसम्मान की तलाश’ में ही ‘ईसाईयत’ को चुना था। परन्तु यहाँ चर्च नेतृत्व ने उनके साथ ‘विश्वासघात’ ही किया है। मूवमेंट के नेता आर.एल.फ्रांसिस ने कहा कि भारत सरकार के बाद चर्च एक संगठित ईकाई है जो देश में सबसे ज्यादा रोजगार उपलब्ध करवाती है। चर्च धर्मांतरित इसाइयों की मौजूदा स्थिति का ठीकरा भारत सरकार के सिर फोड़कर अपनी जिम्मेदारी से बच नही सकता। मूवमेंट नेता ने कहा कि ‘रंगनाथ मिश्र आयोग की रिपोर्ट’ को लागू करने से ‘ईसाईयत’ में जातिवाद की जड़ें इतनी गहरी हो जाएगी कि दोबारा उसे मिटया नही जा सकेगा। मूवमेंट नेता ने ‘भारतीय बिशप कांफ्रेस, वेटिकन एवं वर्ल्ड चर्च कौंसिल’ से मांग की कि वह आजादी के बाद से ‘धर्मांतरित इसाइयों’ के नाम पर आये विदेशी धन का खुलासा करे और यह बताएं कि स्वतंत्रता के 62 वर्षों में जहां चर्च अपना साम्राज्य फैलाने के साथ साथ और वैभवशाली होता गया है वहीं उसके अनुयायी इतनी दयानीय स्थिति में क्यों है कि उनके विकास के लिए सरकार की दया की जरुरत पड़ रही है।........जय भारत

के द्वारा:

मेरे परम स्नेही मित्र डेनियल जी ,,,मे तो इस बात को लेकर चिंतित हूँ की ईसाई धर्म बच भी पायेगा या नही,क्योंकि आपके ईसाईयत के घर वेटिकन में ही लोग ईसाई धर्म से विमुख होकर हिन्दू धर्म एवं जीवन शैली अपना रहें (हिन्दू धर्म एवं जीवन शैली तो अथाह सागर है जिसमे न जाने कितने आये और इसके रंग में रंग गये ,,और यही भारतीयता की असली पहचान है ,सबको अपने रंग में रंग लेना ) फिर ईसाईयत क्या चीज है ,,महोदय हर धर्म की उत्पत्ति किसी के विरोध में ही हुई है ,ईसाईयत की भी तो,,, आपके अन्दर अन्तर्द्वन्द एवं क्रोध उठना स्वाभाविक है क्योंकि आपके धर्म एवं अन्य सभी धर्मों का सृजन का कारण विरोध करना ही था ,,कहीं आपके ऊपर अत्याचार हुए तो कहीं पर आपने अत्याचार किये ,,परन्तु मूल में तो विरोध ही था न ) परन्तु सनातन धर्म जैसा शब्दों से ही विदित है की न ही किसी के विरोध में और न ही किसी के विरुद्ध था आपके भी विरुद्ध नही है क्योंकि सनातन धर्मावलम्बियों को पता है की आप भी इस अथाह सागर में अपना अस्तित्व खो देंगे इतिहाश इसका शाक्छी है ,,आप का क्रोधित एवं उन्मादित होना स्वाभाविक ही है पहाडी नदी जल्दी ही तट बंध तोड़ देती है ,परन्तु परेशान न हों उस विनाशकारी जल को संभालने के लिए सनातन धर्म रूपी समुद्र सदैव ही आपके साथ रहेगा ,,,,आपके संज्ञान में एक बात और लाना चाहता हूँ की जो भी बाहरी धर्म भारत में आये वह अपना मूल स्वरूप भूल कर सनातनी संस्कृति में रंग गये काल सबसे बड़ा न्यायकर्ता है समयोपरांत आपको भी उसकी शक्ति का ज्ञान हो जाएगा तब आप भी उस नवीन दृष्टी से सत्य को देख पायेंगे ,,मेरा आप से विनम्र निवेदन है की अपने मन को स्थिर रखते हुए सत्य पथ पर चलने का प्रयाश करें जब आप उन्माद से विलग हो जाएँ तब समग्र चिंतन के उपरान्त स्थितियों का विश्लेषण करिएगा ,,परमपिता आपको सत्य मार्ग की तरफ अग्रशर करे इसी कामना के साथ ....जय भारत

के द्वारा:

ओडिशा के कंधमाल जिले के जलेशपटा आश्रम में जन्माष्टमी के दिन स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्या के बाद चर्च की गतिविधि एक बार फिर चर्चा में आ गयी । इसके साथ ही चर्च का मध्यकालीन बर्बर चेहरा तथा चर्च का अभारतीय कृत्य लोगों के सामने आ गया । ईसाई मिशनरियां सेवा का बहाना करते हैं। किन्तु उनका असली उद्देश्य अपनी सत्ता व साम्राज्य स्थापित करना है। भारतीयों को अपने संस्कृति के जडों से काटना और उनका यूरोपीयकरण करना है। . स्वतंत्रता से पूर्व चर्च व ईसाई मिशनरियां किसके हित के लिए काम कर रहे थे। पश्चिमी शक्तियों के साम्राज्यवादी हितों की पूर्ति के लिए उन्होंने चर्च को एक औजार के रुप में इस्तमाल किया। 1859 में ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री लार्ड पामस्टर्न ने कहा था कि यह ब्रिटेन के हित में है कि भारत के हिस्से से दूसरे हिस्से तक ईसाइयत का प्रचार किया जाना चाहिए। उनके इस कथन को ठीक से समझने की आवश्यकता है। पश्चिमी साम्राज्यवादी शक्तियां भारत में अपना साम्राज्य को बरकरार रखने के लिए चर्च का इस्तमाल कर रहे थे। जोसेफ कर्नवालिस कुमारप्पा प्रसिध्द गांधीवादी थे। वह स्वयं एक ईसाई भी थे। उन्होंने एक बार कहा था कि पश्चिमी शक्तियों के चार सेना हैं। थल सेना- वायु सेना- नौ सेना तथा चर्च। स्वयं एक ईसाई होने के बावजूद उनकी दृष्टि में चर्च और मिशनरियां अंग्रेजों के सेना के रुप में कार्य कर रहे थे और अंग्रेज साम्राज्य को बचाने के लिए कार्यरत थे। मतांतरित ईसाइयों के मन में भारत के प्रति श्रध्दाभाव खत्म हो जाता था और वे अंग्रेजों के आज्ञाकारी सेवक बन जाते थे। यही कारण था कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में जोसेफ कुमारप्पा व ई.एम. जार्ज के अलावा किसी और ईसाई का नाम प्रमुखता से नहीं आता है। लेकिन इन दोनों के द्वारा स्वतंत्रता की मांग किये जाने के कारण इन्हें जान से मारने की धमकी भी दी गई थी। भारतीय ईसाइयों ने इन दोनों की न केवल निंदा की बल्कि इनका सामाजिक बहिष्कार भी किया। यही कारण था देश के दूसरे राष्ट्रपति डा. सर्वपल्ली राधाकृष्णन को कहना पडा था कि भारत में ईसाइयों के लिए एक हाथ में तलवार और दूसरे हाथ में यूनियन जैक को लेकर चल रहे थे। देश के दूसरे राष्ट्रपति डा. सर्वपल्ली राधाकृष्णन को कहना पडा था कि भारत में ईसाइयों के लिए एक हाथ में तलवार और दूसरे हाथ में यूनियन जैक को लेकर चल रहे थे। यह तो थी स्वतंत्रता से पूर्व की बातें। स्वतंत्रता के बाद ने चर्च ने क्या अपनी पुरानी नीति बदल ली। चर्च ने अपना वही भारत विरोधी कार्य जारी रखा। चर्च की नीति स्पष्ट है- चर्च का राजनीतिक उद्देश्य स्पष्ट है। स्वतंत्रता के बाद भारत में विशेषकर उत्तरपूर्व राज्यों में चर्च ने जो कार्य किया है उससे चर्च के असली राजनीतिक उद्देश्य का पता चलता है। उत्तर-पूर्व के राज्यों में चर्च को मिली खुली छूट के कारण नागालैण्ड जैसे अलगाववाद की बात करते हैं और भारत से अलग होने की बात करते हैं। यह चर्च के कारण ही संभव हो सका है। चर्च चाहता है कि भारत कमजोर हो - इसलिए वह इस तरह के कार्य करता रहता है। जो शक्तियां भारत को कमजोर देखना चाहती हैं वह चर्च को खूब पैसा देते हैं ताकि उनके इरादे पूरे हो सकेँ। नगालैण्ड में क्राइस्ट फार नागालैण्ड के नारे लगाये जा रहे हैं। मिजोरम में भी यही हालत है। वहां रियांग जनजाति के 60 हजार लोगों को चर्च समर्थित ईसाई आतंकवादियों द्वारा अपना धर्म न बदलने के कारण मिजोरम से बाहर भेज दिया है। रियांग जनजाति के लोग अब शरणार्थी के रुप में जीवन जीने के लिए मजबूर हैं। केवल नगालैण्ड में 40 ईसाई मिशनरी समूह तथा 18 आतंकवादी संगठन काम कर रहे हैं। नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल आफ नगालैण्ड हिंसक आतंकवादी संगठनों को वर्लड काउंसिल आफ चर्चेस के माघ्यम से धनराशि तथा और शस्त्र प्राप्त कर रहे हैं। नगालैण्ड में क्राइस्ट फार नागालैण्ड के नारे लगाये जा रहे हैं। मिजोरम में भी यही हालत है। वहां रियांग जनजाति के 60 हजार लोगों को चर्च समर्थित ईसाई आतंकवादियों द्वारा अपना धर्म न बदलने के कारण मिजोरम से बाहर भेज दिया है। रियांग जनजाति के लोग अब शरणार्थी के रुप में जीवन जीने के लिए मजबूर हैं। केवल नगालैण्ड में 40 ईसाई मिशनरी समूह तथा 18 आतंकवादी संगठन काम कर रहे हैं। नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल आफ नगालैण्ड हिंसक आतंकवादी संगठनों को वर्लड काउंसिल आफ चर्चेस के माघ्यम से धनराशि तथा और शस्त्र प्राप्त कर रहे हैं। ये विदेशी शक्तियां एके-47 के माध्यम से बंदूक के नोक पर धर्मांतरण करवा रहे हैं। इसके अलावा भारत के सुरक्षा बल भी इस इलाके में चर्च समर्थित आतंकवादी संगठनों के निशाने पर हैं। अब तक इस इलाके में 50 हजार सुरक्षाकर्मी बलिदान दे चुके हैं। . केवल नगालैण्ड व मिजोरम में ही चर्च का यह घिनौना कार्य चल रहा है - ऐसा नहीं है। उत्तर-पूर्व के बाकी राज्यों में भी यही हाल है। त्रिपुरा में नेशनल लिबरेशन फ्रांट आफ त्रिपुरा (एनएलएफटी) नामक एक आतंकी संगठन काम करता है। उत्तरी त्रिपुरा के नागमनलाल हलाम जिले में बाप्टिस्ट मिशनरी चर्च से हथियारों का जखीरा पकडा गया था। इस चर्च के सचिव ने स्वीकार किया है कि यह हथियार तथा विस्फोटक आतंकवादी संगठन नेशनल लिबरेशन फ्रांट आफ त्रिपुरा के आतंकियों के लिए था। स्वयं केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने संसद ने इस घटना के बारे में जानकारी होने की बात कही है। चर्च का इससे बडा राष्ट्रविरोधी करतूतों का उदाहरण और क्या हो सकता है। . चर्च एक और भारत विरोधी काम में लगा रहता है। वह यह है कि भारत के खिलाफ पूरे विश्व में झूठे प्रचार करना। भारत के खिलाफ माहौल तैयार करना। चर्च के आरोपों में कोई सच्चाई नहीं होती है यह बाद में जांच के बाद स्पष्ट हो जाता है। लेकिन उस समय वह इतने जोर शोर से इन बातों को कहते हैं - जिससे यह कई बार सच प्रतीत होता है। इस पूरी प्रक्रिया में भारतीय चर्च का साथ देता है पश्चिमी मीडिया। ये मिल कर भारत के खिलाफ झूठे प्रचार करते हैं और भारत की छवि खराब करते हैं। एक- दो उदाहरण दें तो शायद इसे ठीक से समझा जा सकता है। कुछ साल पहले चर्च द्वारा यह आरोप लगाया गया कि मध्य प्रदेश के झाबुआ में ननों के साथ बलात्कार किया गया है और इसमें हिन्दूवादी संगठनों के हाथ है। लेकिन बाद में जांच के बाद पता चला कि मध्य प्रदेश के कांग्रेस सरकार द्वारा जिन्हें गिरफ्तार किया गया था वे सब धर्मांतरित ईसाई हैं। कुछ साल पहले चर्च द्वारा यह आरोप लगाया गया कि मध्य प्रदेश के झाबुआ में ननों के साथ बलात्कार किया गया है और इसमें हिन्दूवादी संगठनों के हाथ है। लेकिन बाद में जांच के बाद पता चला कि मध्य प्रदेश के कांग्रेस सरकार द्वारा जिन्हें गिरफ्तार किया गया था वे सब धर्मांतरित ईसाई हैं। बाद में यह भी पता चला कि यह लूटमार की घटना है जिसे बलात्कार का रंग दे दिया गया था। इस तरह के अनेक उदाहरण दिये जा सकते हैं। . स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद मध्य प्रदेश की कांग्रेस सरकार ने चर्च की धर्मांतरण गतिविधियों तथा इनके कार्यकलापों की जांच के लिए 1956 में न्यायमूर्ति भवानी शंकर नियोगी की अध्यक्षता में एक कमेटी गठित की थी। इस कमेटी की खास बात यह थी कि इसमें एस।के। जार्ज नाम के एक ईसाई विद्वान भी थे। इस कमेटी ने इस समिति ने व्यापक जांच करने के बाद चर्च के गतिविधियों के बारे में जो पाया वह वास्तव में आंखें खोल देने वाली हैं। समिति ने पाया चर्च एक अंतरराष्ट्रीय षडयंत्र का हिस्सा है। चर्च के कार्य का मूल उद्देश्य धर्मांतरण के माध्यम से राष्ट्रांतरण है। राष्ट्रांतरण से देश की एकता व अखंडता खतरे में पड जाती है। चर्च धर्मांतरण के लिए छल- झूठ- प्रलोभन तथा भय का सहारा लेती है। चर्च के कार्य का मूल उद्देश्य धर्मांतरण के माध्यम से राष्ट्रांतरण है। राष्ट्रांतरण से देश की एकता व अखंडता खतरे में पड जाती है। चर्च धर्मांतरण के लिए छल- झूठ- प्रलोभन तथा भय का सहारा लेती है। न्यायमूर्ति भवानी शंकर नियोगी की अध्यक्षता में गठित कमेटी की रिपोर्ट में जो अनुशंसाएं की गई हैं उससे चर्च के खतरनाक इरादों के बारे में पता चलता है। साथ ही कमेटी ने अपने सिफारिशों में चर्च के इस राष्टरविरोधी कृत्यों से कैसे निपटा जाना चाहिए इसके लिए कुछ अनुशंसाएं की हैं। कमेटी के मुख्य अनुशंसाएं इस प्रकार के हैं। कमेटी की सबसे पहली सिफारिश है कि जिन मिशनरियों का मुख्य उद्देश्य केवल धर्म परिवर्तन है उन्हें वापस जाने के लिए कहा जाए। देश के भीतर विदेशी मिशनरियों का बहु त संख्या में आना अवांछनीय है और इसकी रोक थाम होनी चाहिए। समिति ने अपनी दूसरी सिफारिश में कहा है कि भारतीय चर्च के लिए सबसे प्रथम मार्ग यह है कि वे भारत के लिए एक संयुक्त ईसाई चर्च की स्थापना करे जो विदेश से आने वाली सहायता पर निर्भर न रहे। समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि ऐसी चिकित्सा संबंधी सेवाओं तथा व अन्य सेवाओं को- जो धर्म परिवर्तन के कार्य के लिए कोम में लायी जाती हों उसे कानून द्वारा वर्जित कर दी जानी चाहिए। दबाव- छल कपट- अनुचित भय- आर्थिक या दूसरी प्रकार की सहायता का आश्वासन देकर- किसी व्यक्ति की आवश्यकता- मानसिक दुर्बलता तथा मुर्खता का लाभ उठा कर धर्मांतरण के प्रयास को सर्वथा रोक देना चाहिए। समिति ने अपने रिपोर्ट में सरकार से कहा है कि सरकार का यह प्रथम कर्तब्य है कि वह अनाथालयों का स्वयं संचालन करे क्योंकि जिन नाबालिगों के माता पिता या संरक्षक नहीं हैं उनकी वैधानिक संरक्षक सरकार ही है। धर्म प्रचार के लिए जो भी साहित्य हो वह बिना सरकार के अनुमति से वितरित नहीं किया जाना चाहिए। नियोगी कमेटी की इस रिपोर्ट ईसाई मिशनरियों की गतिविधियों की काली करतुतों का कच्चा चिट्ठा प्रस्तुत करता है। इस कमेटी ने अपने रिपोर्ट में चर्च के सुनियोजित भारतविरोधी कार्यों के प्रति आगाह किया था। लेकिन दुर्भाग्य से हमारे देश के सत्ताधीशों ने इस रिपोर्ट से कोई सीख नहीं ली। चर्च को खुली छूट मिली हुई है। चर्च अपना काम धडल्ले से कर रहा है और भारत को कमजोर करने के उसके मूल उद्देश्य की पूर्ति में लगा हुआ है। उत्तर पूर्व राज्यों में इसका प्रभाव साफ दिख रहा है। वहां अलगाववाद अपने चरम पर है। चर्च सेवा की आड में या कहें तो सेवा के मुखौटे में भारत को तोडने की अपपनी मूल उद्देश्य की ओर बढ रहा है। गत 4 दशकों से अधिक समय हुए ओडिशा के जनजातीय जिले में सेवा के कार्य में अपना जीवन लगा चुके स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती की हत्या को भी इसी क्रम में देखा जा सकता है। न्यायमूर्ति भवानी शंकर नियोगी की रिपोर्ट को अभी लगभग पचास साल हो गये हैं। इन पचास सालों में चर्च ने अपने गतिविधियों को और बढाया है। धर्मांतरण के लिए विभिन्न देशों से आ रही सहायता राशि में भी बढोत्तरी हुई है। चर्च ने अपनी रणनीति भी बदली है। चर्च इन दिनों काफी आक्रमक है। चर्च द्वारा प्रकाशित पुस्तक आपरेशन वर्ल्ड तथा जोशुआ प्रोजेक्ट का अगर हम अध्ययन करें तो चर्च के खतरनाक मनसूबों के बारे में हमें पता चलता है। चर्च के सेवा के आड में भारत विरोधी गतिविधियों की अनदेखी अब कितने दिन तक होती रहेगी। अगर यही हाल रहा तो पूर्वोत्तर राज्यों में जो स्थित है वह देश के अन्य राजों में भी हो सकता है। इस कारण आवश्यकता इस बात की है कि चर्च के इस देशविरोधी गतिविधियों की जांच के लिए एक कमेटी गठित की जाए। यह कमेटी चर्च के राष्ट्रविरोधी गतिविधियों की जांच करे। चर्च को मिल रहे पैसा कहां से आ रहा है- किस लिए आ रहा है तथा इसका उपयोग कैसे हो रहा है इस बात की पूरी जांच होनी चाहिए। विदेश से जो आर्थिक सहायता दे रहे हैं उनका राजनीतिक उद्देश्य क्या है इस बात की भी जांच होनी चाहिए। इस जांच रिपोर्ट के आधार पर सरकार को चर्च के राष्ट्रविरोधी गतिविधि पर आवश्यकीय रोक लगाने चाहिए। सरकार को यह कार्य जल्द से जल्द करना चाहिए- अन्यथा काफी देर हो सकती है। देश के शेष राज्यों की हालत उत्तर पूर्व के राज्यों की तरह हो सकती है। . अब तक चर्च संगठन अपने खिलाफ किसी भी न्यायिक प्रशासनिक निर्णय को मानने से इंकार करता रहा है. चर्च कहता रहा है कि जस्टिस नियोगी की रिर्पोट को हम नही मानते- धर्मांतरण विरोधी कानून हमारी धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला हैं। डीपी वाधवा आयोग की रिर्पोट झूठ बोलती है। कंधमाल में हुए साप्रदायिक दंगों के बाद बनाए गए जस्टिस एस़सी मोहपात्रा आयोग की रिर्पोट दक्षिणपंथी संगठनों के प्रभाव में बनाई गई लगती है इसलिए यह विचार करने योग्य ही नही है। और अब ऑस्ट्रेलियाई मिशनरी ग्राहम स्टेन्स और उनके दो बेटों की हत्या के मामले में सुप्रीम कोर्ट के दो विद्वान न्यायधीशों द्वारा ग्राहम स्टेन्स के काम-काज और धर्मांतरण पर की गई टिप्पणीयों पर नराजगी जाहिर करते हुए इसे फैसले से हटाने की मांग की जा रही है। चर्च का तर्क है कि इससे कंधमाल के मामलों पर असर पड़ेगा। भारत का चर्च आज हर उस चीज को नकारने में लगा हुआ है जो उसके काम-काज पर अंगुली उठाती हो। देश भर में मिशनरियों के काम-काज के तरीकों और धर्म-प्रचार को लेकर स्वाल उठते रहे है और कई आयोगों और जांच एजेंसियों ने ईसाई समुदाय और बहूसंख्यकों के बीच बढ़ते तनाव को मिशनरियों की धर्मांतरण जैसी गतिविधियों को जिम्मेवार माना है परन्तु भारतीय चर्च नेता ऐसी रिर्पोटों को सिरे से ही खारिज कर देते है। पर हाल ही में ऑस्ट्रेलियाई मिशनरी ग्राहम स्टेन्स और उनके दो बेटों की हत्या के मामले में माननीय सुप्रीम कोर्ट ने जो फैसला सुनाया है उसके गंभीर मायने है और चर्च नेताओं को अब आत्म-मंथन की जरुरत है। . ऑस्ट्रेलियाई मिशनरी ग्राहम स्टेन्स और उनके दो बेटों की हत्या के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने दारा सिंह को मृत्यु दंड दिए जाने की केन्द्रीय सरकार की मांग को नमंजूर करते हुए उसकी उम्र कैद की सजा को बरकरार रखा है। दारा सिंह के सहयोगी महेंद्र हेंब्रम को भी उम्र कैद की सजा सुनाई गई है। अन्य 11 अभियुक्तों को कोर्ट ने रिहा करने का आदेश दिया है। केन्द्रीय जांच ब्यूरों सीबीआई ने इस मामले में मृत्यु दंड की मांग की थी। ऑस्ट्रेलियाई मिशनरी ग्राहम स्टेन्स और उनके दो नाबलिग बेटों फिलिप और टिमोथी को ओडिशा के क्योंझर जिले के मनोहरपुर गांव में 22 जनवरी 1999 को भीड़ ने जिंदा जला दिया था। स्टेंन्स पिछले तीन दशकों से कुष्ठ रोगियों के साथ काम कर रहे थे. वे कई सामाजिक गतिविधियों में भी शामिल थे. इसी के साथ क्षेत्र में उनकी गतिविधियों को लेकर तनाव भी लम्बे समय से बरकरार था क्षेत्र के गैर ईसाइयों का आरोप था कि सामाजिक गतिविधियों की आड़ में वह धर्मांतरण करवा रहे थे। . ऑस्ट्रेलियाई मिशनरी ग्राहम स्टेन्स की हत्या की गंभीरता को देखते हुए एक सप्ताह के भीतर ही केन्द्र सरकार ने मामले की जांच के लिए जस्टिस डी पी वधवा की अध्यक्षता में एक आयोग का गठन कर दिया था। ओडिशा सरकार ने एक महीने के अंदर स्टेन्स हत्याकांड की जांच सीबीआई को सौंप दी थी। भारतीय चर्च संगठनों और गैर सरकारी सगंठनों ने इस मामले को अंतरराष्ट्रीय तूल देने में कोई कसर बाकी नही रखी। जिस तरह से स्टेन्स और उनके दो नाबालिग बेटों की हत्या की गई थी मानवता में विश्वास रखने वाला कोई भी व्यक्ति इसे जायज नही ठहरा सकता। पुलिस रिकार्ड के मुताबिक स्टेन्स ने कार से निकलकर भागने की कोशिश की लेकिन भीड़ ने उसे भागने नही दिया। और पिता-पुत्रों को जिंदा ही जला दिया। . जस्टिस पी सतशिवम और जस्टिस बीएस चौहान की बेंच ने सजा सुनाते हुए कहा कि फंासी की सजा ‘दुर्लभ से दुर्लभतम’ मामले में दी जाती है। और यह प्रत्येक मामले में तथ्यों और हालात पर निर्भर करती है। मौजूदा मामले में जुर्म भले ही कड़ी भर्त्सना के योग्य है। फिर भी यह दुर्लभत्म’ मामले की श्रेणी में नही आता है। अतः इसमें फांसी नही दी जा सकती। विद्ववान न्यायाधीशों ने अपने फैसले में यह भी कहा कि लोग ग्राहम स्टेन्स को सबक सिखाना चाहते थे। क्योंकि वह उनके क्षेत्र में धर्मांतरण के काम में जुटा हुआ था। . सुप्रीम कोर्ट द्वारा ऑस्ट्रेलियाई मिशनरी ग्राहम स्टेन्स की हत्या पर फैसला सुनाते हुए कहा गया कि किसी भी व्यक्ति की आस्था और और विश्वास में हस्तक्षेप करना और इसके लिए बल का उपयोग करना- उतेजना का प्रयाग करना- लालच का प्रयोग करना- या किसी को यह झूठा विश्वास दिलावना की उनका धर्म दूसरे से अच्छा है और ऐसे तरीकों का इस्तेमाल करते हुए किसी व्यक्ति का धर्मातरंण करना (धर्म बदल देना) किसी भी आधार पर न्यायसंगत नही कहा जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस प्रकार के धर्मांतरण से हमारे समाज की उस संरचना पर चोट होती है जिसकी रचना संविधान निर्माताओं ने की थी। विद्वान न्यायाधीशों ने कहा कि हम उम्मीद करते है कि महात्मा गांधी का जो स्वप्न था कि धर्म राष्ट्र के विकास में एक सकारात्मक भूमिका निभाएगा वो पूरा होगा...किसी की आस्था को जबरदस्ती बदलना या फिर यह दलील देना कि एक धर्म दूसरे से बेहतर है उचित नही है। . अगर चर्च नेता चाहें तो सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला मार्गदर्शक बन सकता है। चर्च खुद भी यह जानता है कि उसके धर्म प्रचार करने और ईसाइयत को फैलाने का क्या तरीका है? आज मणिपुर- नागालैड- आसम आदि राज्यों में मिशनरियों द्वारा अपना संख्याबल बढ़ाने के नाम पर खूनी खेल खेला जा रहा है। क्षेत्र के एक कैथोलिक बिशप ‘संयुक्त राष्ट्र संघ’ में जाकर -बैपटिस्ट मिशनरियों से कैथोलिक ईसाइयों की रक्षा करने की गुहार लगा चुके है। गैर ईसाइयों की बात न भी करे तो ईसाई मिशनरियों के अंदर ही अपना संख्याबल बढ़ाने की मारामारी चलती रहती है। हालही में मध्य प्रदेश के कैथोलिक और कुछ गैर कैथोलिक चर्चो ने तय किया है कि वह ‘भेड़-चोरी’ को रोकेगे और दूसरे मिशनरियों के सदस्यों को अपने साथ नही मिलायेगे। आज चर्च का पूरा जोर अपना साम्राज्यवाद बढ़ाने पर लगा हुआ है इस कारण देश के कई राज्यों में ईसाइयों एवं बहुसंख्यक हिन्दुओं के बीच तनाव बढ़ता जा रहा है। धर्मांतरण की गतिविधियों के चलते करोड़ों अनुसूचित जातियों से ईसाई बने लोगों का जीवन चर्च के अंदर दायनीय हो गया है। चर्च नेता उन्हें अपने ढांचे में अधिकार देने के बदले सरकार से उन्हें पुनः अनुसूचित जातियों की सूची में शामिल करने की मांग कर रहे है। धर्मांतरित लोगों के जीवन स्तर को सुधारने के बदले भारतीय चर्च तेजी से अपनी संपदा और संख्या को बढ़ता जा रहा है। चर्च लगातार यह दावा भी करता जा रहा है कि वह देश में लाखों सेवा कार्य चला रहा है पर उसे इसका भी उतर ढूढंना होगा कि सेवा कार्य चलाने के बाबजूद भारतीयों के एक बड़े हिस्से में उसके प्रति इतनी नफरत क्यों है कि 30 सालों तक सेवा कार्य चलाने वाले ग्राहम स्टेन्स को एक भीड़ जिंदा जला देती है और उसके धर्म-प्रचारकों के साथ भी टकराव होता रहता है। ऐसा क्यों हो रहा है इसका उतर तो चर्च को ही ढूंढना होगा। अगर चर्च के स्वरुप तथा धर्मान्तरण के लिए किस भी हद तक जाने की असली तस्बीर देखनी हो तो झारखण्ड के गुमला-सिमडेगा और खूंटी जिलों में देखा जा सकता है जब साम और दाम से काम नहीं चला तब उसने विरोधिओं को समाप्त करने के लिए नक्सली संगठनों से हाथ मिला लिया है .झारखण्ड की सरकार बनने या गिराने की क्षमता है यहाँ के चर्च में- शायद ही लोगो को पता हो की २००३ के स्थानीयता दंगों में चर्च की सीधी भूमिका थी क्योंकि तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री बाबूलाल मरांडी ने चर्च की नकेल कस दी थी .अभी भी रुक रुक कर चर्च अपने प्रकाशनों में यहाँ के आदिवासियों के रीती रिवाजों का मजाक उडाता रहता है रही बात सेवा तथा कल्याण की तो उसके अस्पताल में रोगि का धर्म ही नहीं ये भी पूछा जाता है की वो कौन ईसाई है कैथोलिक या दूसरा . .

के द्वारा:

के द्वारा: Rajkamal Sharma Rajkamal Sharma

प्रिय डेनिएल, आपने मेरे प्रश्नों का उत्तर नहीं दिया, क्योंकि उसका उत्तर भारत देश का एक और विभाजन है. इसके विपरीत आप जाति की पगडण्डी पर उतर आये. अग्रेजों ने धर्मों में दिवाईद एंड रूल का खेल खेला था ,मिशनरी जाति में घुस कर बांटो और देश तोडो का खेल खेल रही है. आज भारत में चर्चों के माध्यम से विदेश से अरबों रूपया आता है और वह नक्सलियों और नोर्थ ईस्ट के राज्यों में उग्रवाद फ़ैलाने के काम आता है. देश विरोधी गतिविधियों में मिशनरियां आज़ादी के बाद से लग गयी थीं. अब आपने वार्ता शुरू कर दी है तो मैं एक एक कर सारा इतिहास सामने रखूंगा. नियोगी कमेटी के बारे में अपने शायद ही सुना होगा.  नहीं सुना है तो पूरी रिपोर्ट आपके सामने रखूंगा. भारत में और पूरे विश्व में चर्च के काले कारनामों की लंबी लिस्ट है वो भी आपके सामने रखूंगा. आपने अभी अभी कहा है की एक संस्था है जो पिछले तीस वर्षों से प्रति वर्ष औसतन 17 नए चर्च नए ईसाईयों के लिए बनती है. आपने अपने मुह से भारत में चर्च के बढते क़दमों के बारे में कहा है. ये  एक सुनियोजित साजिश है भारत का एक और विभाजन करने की धर्म के नाम पर. चलिए अब तो एक लंबी बहस होगी. पर एक बात का जवाब दीजिए की जब आप गरीब, भोले भाले लोगों को धर्म परिवर्तन का छलवा दे कर, उनको बेहतर भविष्य के झूठे सपने दिखाकर ईसाई बना देते हैं तब फिर उनके के लिए आरक्षण की बात क्यों करते हैं. जब ईसाईयत में इतनी ताकत नहीं है की वो उनका जीवन स्तर सुधार सके तब फिर उन बेचारों के साथ धर्मपरिवर्तन का नाटक क्यों करते हो. 

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प्रिय डेनियल जी .......प्रमाणों की रोशनी में देखें तो पता चलता है कि भारत में जातियां तो थीं पर छुआ- छूत नहीं. स्वयं अंग्रेजों के द्वारा दिए आंकड़े इसके प्रमाण हैं.भारत को कमज़ोर बनाने की अनेक चालें चलने वाले अंग्रेजों ने आंकड़े जुटाने और हमारी कमजोरी व विशेषताओं को जानने के लिए सर्वे करवाए थे. उन सर्वेक्षणों के तथ्यों और आज के झूठे इतिहास के कथनों में ज़मीन आस्मान का अंतर है.सन 1820 में एडम स्मिथ नामक अँगरेज़ ने एक सर्वेक्षण किया. एक सर्वेक्षण टी. बी. मैकाले ने 1835 करवाया था. इन सर्वेक्षणों से ज्ञात और अनेक तथ्यों के इलावा ये पता चलता है कि तबतक भारत में अस्पृश्यता नाम की बीमारी नहीं थी.यह सर्वे बतलाता है कि—# तब भारत के विद्यालयों में औसतन 26% ऊंची जातियों के विद्यार्थी पढ़ते थे तथा 64% छोटी जातियों के छात्र थे.# 1000 शिक्षकों में 200 द्विज / ब्राह्मण और शेष डोम जाती तक के शिक्षक थे. स्वर्ण कहलाने वाली जातियों के छात्र भी उनसे बिना किसी भेद-भाव के पढ़ते थे.# मद्रास प्रेजीडेन्सी में तब 1500 ( ये भी अविश्वसनीय है न ) मेडिकल कालेज थे जिनमें एम्.एस. डिग्री के बराबर शिक्षा दी जाती थी. ( आज सारे भारत में इतने मेडिकल कालेज नहीं होंगे.)# दक्षिण भारत में 2200 ( कमाल है! ) इंजीनियरिंग कालेज थे जिनमें एम्.ई. स्तर की शिक्षा दी जाती थी.# मेडिकल कालेजों के अधिकांश सर्जन नाई जाती के थे और इंजीनियरिंग कालेज के अधिकाँश आचार्य पेरियार जाती के थे. स्मरणीय है कि आज छोटी जाती के समझे जाने वाले इन पेरियार वास्तुकारों ने ही मदुरई आदि दक्षिण भारत के अद्भुत वास्तु वाले मंदिर बनाए हैं.# तब के मद्रास के जिला कलेक्टर ए.ओ.ह्युम ( जी हाँ, वही कांग्रेस संस्थापक) ने लिखित आदेश निकालकर पेरियार वास्तुकारों पर रोक लगा दी थी कि वे मंदिर निर्माण नहीं कर सकते. इस आदेश को कानून बना दिया था.# ये नाई सर्जन या वैद्य कितने योग्य थे इसका अनुमान एक घटना से हो जाता है. सन 1781 में कर्नल कूट ने हैदर अली पर आक्रमण किया और उससे हार गया . हैदर अली ने कर्नल कूट को मारने के बजाय उसकी नाक काट कर उसे भगा दिया. भागते, भटकते कूट बेलगाँव नामक स्थान पर पहुंचा तो एक नाई सर्जन को उसपर दया आगई. उसने कूट की नई नाक कुछ ही दिनों में बनादी. हैरान हुआ कर्नल कूट ब्रिटिश पार्लियामेंट में गया और उसने सबने अपनी नाक दिखा कर बताया कि मेरी कटी नाक किस प्रकार एक भारतीय सर्जन ने बनाई है. नाक कटने का कोई निशान तक नहीं बचा था. उस समय तक दुनिया को प्लास्टिक सर्जरी की कोई जानकारी नहीं थी. तब इंग्लॅण्ड के चकित्सक उसी भारतीय सर्जन के पास आये और उससे शल्य चिकित्सा, प्लास्टिक सर्जरी सीखी. उसके बाद उन अंग्रेजों के द्वारा यूरोप में यह प्लास्टिक सर्जरी पहुंची.अब ज़रा सोचें कि भारत में आज से केवल 175 साल पहले तक तो कोई जातिवाद याने छुआ-छूत नहीं थी. कार्य विभाजन, कला-कौशल की वृद्धी, समृद्धी के लिए जातियां तो ज़रूर थीं पर जातियों के नाम पर ये घृणा, विद्वेष, अमानवीय व्यवहार नहीं था. फिर ये कुरीति कब और किसके द्वारा और क्यों प्रचलित कीगई ? हज़ारों साल में जो नहीं था वह कैसे होगया? अपने देश-समाज की रक्षा व सम्मान के लिए इस पर खोज, शोध करने की ज़रूरत है. यह अमानवीय व्यवहार बंद होना ही चाहिए और इसे प्रचलित करने वालों के चेहरों से नकाब हमें हटनी चाहिए. साथ ही बंद होना चाहिए ये भारत को चुन-चुन कर लांछित करने के, हीनता बोध जगाने के सुनियोजित प्रयास. हमें अपनी कमियों के साथ-साथ गुणों का भी तो स्मरण करते रहना चाहिए जिससे समाज हीन ग्रंथी का शिकार न बन जाये. यही तो करना चाह रहे हैं हमारे चहने वाले, हमें कजोर बनाने वाले. उनकी चाल सफ़ल करने में‚ सहयोग करना है या उन्हें विफ़ल बनाना है? ये ध्यान रहे!अंग्रेजों ने सर्वेक्षण करके जो आंकड़े जुटाए वो पूर्णतया उचित थे लेकिन उनको भारतीय समूह के सामने लाया गया पूर्णतया फेरबदल करने के बाद जो की भारतीय जनमानस की आत्मीयता, शिक्षा पद्धती, संस्कृति, परम्पराओं, विज्ञान, खगोल, ज्योतिष, आयुर्वेद, चिकित्सा, वेशभूषा, खानपान, रहन सहन आदि को पूर्णतया बदलने के और ईसाईयत को भारत में प्रभावशाली बनाने हेतु किया गया lप्रसिद्ध गांधीवादी धर्मपाल जी ने इस विषय पर अंग्रेजों के समस्त एकत्रित और वितरित किये गए आंकड़ों की वास्तविकता सबके सामने रखी और दोनों में जो अंतर थे उनकी असमानताओं को उजागर किया //// मित्र इसको भी देखना .....तुम्हारे उत्तर के प्रतीक्छा में .........जय भारत

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प्रिय मित्र डेनियल जी ,,,इसे आपने भी पढ़ा होगा ,, पोप बेनेडिक्ट सोलहवें और कैथोलिक चर्च की दया, शाति और कल्याण की असलियत दुनिया के सामने उजागर हो ही गई। जब पोप बेनेडिक्ट सोलहवें और कैथोलिक चर्च का क्रूर-अनैतिक चेहरा सामने आया, तब 'विशेषाधिकार' का कवच उठाया गया। कैथोलिक चर्च ने नई परिभाषा गढ़ दी कि उनके धर्मगुरु पोप बेनेडिक्ट सोलहवें पर न तो मुकदमा चल सकता है और न ही उनकी गिरफ्तारी संभव हो सकती है। इसलिए कि पोप बेनेडिक्ट न केवल ईसाइयों के धर्मगुरु हैं, बल्कि वेटिकन सिटी के राष्ट्राध्यक्ष भी हैं। एक राष्ट्राध्यक्ष के तौर पर पोप बेनेडिक्ट सोलहवें की गिरफ्तारी हो ही नहीं सकती है। जबकि अमेरिका और यूरोप में कैथलिक चर्च और पोप बेनेडिक्ट सोलहवें की गिरफ्तारी को लेकर जोरदार मुहिम चल रही है। न्यायालयों में दर्जनों मुकदमें दर्ज करा दिए गए हैं और न्यायालयों में उपस्थित होकर पोप बेनेडिक्ट सोलहवें को आरोपों का जवाब देने के लिए कहा जा रहा है। यह सही है कि पोप बेनेडिक्ट सोलहवें के पास वेटिकन सिटी के राष्ट्राध्यक्ष का कवच है। इसलिए वे न्यायालयों में उपस्थित होने या फिर पापों के परिणाम भुगतने से बच जाएंगे, लेकिन कैथोलिक चर्च और पोप की छवि तो धूल में मिली ही है। इसके अलावा चर्च में दया, शाति और कल्याण की भावना जागृत करने की जगह दुष्कर्मो की पाठशाला कायम हुई है, इसकी भी पोल खुल चुकी है। चर्च पादरियों द्वारा यौन शोषण के शिकार बच्चों के उत्थान के लिए कुछ भी नहीं किया गया और न ही यौन शोषण के आरोपी पादरियों के खिलाफ कोई कार्रवाई हुई है। इस पूरे घटनाक्रम को अमेरिका-यूरोप की मीडिया ने 'वैटिकन सेक्स स्कैंडल' का नाम दिया हैं। कुछ दिन पूर्व ही पोप बेनेडिक्ट सोलहवें ने आयरलैंड में चर्च पादरियों द्वारा बच्चों के यौन शोषण के मामले प्रकाश में आने पर इस कुकृत्य के लिए माफी मागी थी।पोप पर आरोप ,पोप बेनेडिक्ट सोलहवें पर कोई सतही नहीं, बल्कि गंभीर और प्रमाणित आरोप हैं, जो उनकी एक धर्माचार्य और राष्ट्राध्यक्ष की छवि को तार-तार करते हैं।अब सवाल यह है कि पोप बेनेडिक्ट सोलहवें पर आरोप हैं क्या? पोप बेनेडिक्ट सोलहवें पर दुष्कर्मी पादरियों को संरक्षण देने और उन्हें कानूनी प्रक्रिया से छुटकारा दिलाने के आरोप हैं। पोप बेनेडिक्ट सोलहवें ने कई पादरियों को यौन शोषण के अपराधों से बचाने जैसे कुकृत्य किए हैं, लेकिन सर्वाधिक अमानवीय, लोमहर्षक व चर्चित पादरी लारेंस मर्फी का प्रकरण है। लारेंस मर्फी 1990 के दशक में अमेरिका के एक कैथोलिक चर्च में पादरी थे। उस कैथलिक चर्च में अनाथ, विकलाग और मानसिक रूप से बीमार बच्चों के लिए एक आश्रम भी था।पादरी लारेंस मर्फी पर 230 से अधिक बच्चों का यौन शोषण का आरोप है। सभी 230 बच्चे अपाहिज और मानसिक रूप से विकलाग थे। इनमें से अधिकतर बच्चे बहरे भी थे। मानिसक रूप से बीमार और अपाहिज बच्चों के साथ यौन उत्पीड़न की धटना सामने आने पर अमेरिका में तहलका मच गया था। कैथोलिक चर्च की छवि के साथ ही साख पर संकट खड़ा हो गया था। कैथोलिक चर्च में विश्वास करने वाली आबादी इस घिनौने कृत्य से न केवल आक्रोशित थी, बल्कि कैथोलिक चर्च से उनका विश्वास भी डोल रहा था। कैथोलिक चर्च को बच्चों के यौन उत्पीड़न पर संज्ञान लेना चाहिए था और सच्चाई उजागर कर आरोपित पादरी पर अपराधिक दंड संहिता चलाने में मदद करनी चाहिए थी, लेकिन कैथोलिक चर्च ने ऐसा किया नहीं। कैथोलिक चर्च को इसमें अमेरिकी सत्ता की सहायता मिली। विवाद के पाव लंबे होने से कैथलिक चर्च की नींद उड़ी और उसने आरोपित पादरी लारेंस मर्फी पर कार्रवाई के लिए वेटिकन सिटी और पोप को अग्रसारित किया था।पोप बेनेडिक्ट सोलहवें का उस समय नाम कार्डिनल जोसेफ था और वैटिकन सिटी के उस विभाग के अध्यक्ष थे, जिनके पास पादरियों द्वारा बच्चों के साथ यौन उत्पीड़न किए जाने की जाच का जिम्मा था। पोप बेनेडिक्ट ने पादरी लारेंस मर्फी को सजा दिलाने में कोई रुचि नहीं दिखाई। बात इतनी भर थी नहीं। बात इससे आगे की थी। मामले को रफा-दफा करने की पूरी कोशिश हुई। लारेंस मर्फी को अमेरिकी काूननों के तहत गिरफ्तारी और दंड की सजा में रुकावटें डाली गई।वेटिकन सिटी का कहना था कि पादरी लारेंस मर्फी भले आदमी हैं और उन पर दुर्भावनावश यौन शोषण के आरोप लगाए गए हैं। इसमें कैथोलिक चर्च विरोधी लोगों का हाथ है, जबकि मर्फी पर लगे आरोपों की जाच कैथोलिक चर्च के दो वरिष्ठ आर्चविशपों ने की थी। सिर्फ अमेरिका तक ही कैथोलिक चर्च में यौन शोषण का मामला चर्चा में नहीं है, बल्कि वैटिकन सिटी में भी यौन शोषण के कई किस्से चर्चे में रहे हैं।पुरुष वेश्यावृति के मामले में भी वेटिकन सिटी घिरी हुई है। वैटिकन सिटी में पादरियों द्वारा पुरुष वैश्यावृति के राज पुलिस ने खोले थे। वेटिकन धार्मिक संगीत मंडली के मुख्य गायक टामस हीमेह और पोप बेनेडिक्ट के निजी सहायक एंजलो बालडोची पर पुरुष वैश्या के साथ संबंध बनाने के आरोप लगे थे।(((((((((((((((((((दुष्कर्मी पादरी भारत में भी!)))))))))))))))))))) यौन शोषण के आरोपित पादरियों के नाम बदले गए। उन्हें अमेरिका-यूरोप से बाहर भेजकर छिपाया गया, तकि वे आपराधिक कानूनों के जद में आने से बच सकें। खासकर अफ्रीका और एशिया में ऐसे दर्जनों पादरियों को अमेरिका-यूरोप से निकालकर भेजा गया, जिन पर बच्चों के साथ यौन उत्पीड़न के आरोप थे। एक ऐसा ही पादरी भारत में कई सालों से रह रहा है। रेवरेंड जोसेफ फ्लानिवेल जयपाल नामक पादरी भारत में कार्यरत है। जयपाल पर एक चौदह वर्षीय किशोरी के साथ दुष्कर्म करने सहित ऐसे दो अन्य आरोप हैं। अमेरिका के एक चर्च में जयपाल ने वर्ष 2004 में एक अन्य ग्रामीण युवती के साथ बलात्कार किया था। वेटिकन और पोप की कृपा से जयपाल भाग कर भारत आ गया। इसलिए कि बलात्कार की सजा से छुटकारा पाया जा सके। अमेरिकी प्रशासन को जयपाल का अता-पता खोजने में काफी मशक्कत करनी पड़ी। अमेरिकी प्रशासन के दबाव में वेटिकन ने जयपाल का पता जाहिर किया। वेटिकन ने मामला आगे बढ़ता देख जयपाल को कैथोलिक चर्च से बाहर निकालने की सिफारिश की थी, लेकिन भारत स्थित आर्चविशप परिषद ने जयपाल की बर्खास्ती रोक दी। अमेरिकी प्रशासन जयपाल के प्रत्यर्पण की कोशिश कर रहा है, क्योंकि अमेरिकी प्रशासन पर मानवाधिकारवादियों का भारी दबाव है, लेकिन जयपाल ने अमेरिका जाकर यौन अपराधों का सामना करने से इनकार कर दिया है।कैथलिक चर्च के भारतीय आर्चविशपों द्वारा बलात्कारी पादरी जयपाल का संरक्षण देना क्या उचित ठहराया जा सकता है? क्या इसमें भारतीय आर्चविशपों की सरंक्षणवादी नीति की आलोचना नहीं होनी चाहिए। कथित तौर पर कुकुरमुत्ते की तरह फैले मानवाधिकार संगठनों के लिए भी जयपाल कोई मुद्दा क्यों नहीं बना?............रंग लाएगी जनता की मुहिम अमेरिका-यूरोप में पोप बेनेडिक्ट सोलहवें के इस्तीफे की माग जोर से उठ रही है। जगह-जगह प्रदर्शन भी हुए हैं। इंग्लैंड सहित अन्य यूरोपीय देशों में पोप बेनेडिक्ट सोलहवें की यात्राओं में भारी विरोध हुआ है। अनैतिक कृत्य को संरक्षण देने के लिए पोप से इस्तीफा देकर पश्चाताप करने का जनमत तेजी से बन रहा है। पोप के खिलाफ जनमत की इच्छा शायद ही कामयाब होगी। पोप के इस्तीफे का कोई निश्चित संविधान नहीं है। पर इस्तीफे जुड़े कुछ तथ्य हैं, लेकिन ये स्पष्ट नहीं हैं। वर्ष 1943 में पोप पायस बारहवें ने एक लिखित संविधान बनाया था, जिसका मसौदा था कि अगर पोप का अपहरण नाजियों ने कर लिया तो माना जाना चाहिए कि पोप ने त्यागपत्र दे दिया है और नए पोप के चयन की प्रक्रिया शुरू की जा सकती है। अब तक न तो नाजियों और न ही किसी अन्य ने किसी पोप का अपहरण किया है। इसलिए पोप पायस बारहवें के सिद्धात को अमल में नहीं लाया जा सका है। पोप बेनेडिक्ट सोलहवें पर यह निर्भर करता है कि वे त्यागपत्र देंगे या नहीं, पर वेटिकन सिटी की विभिन्न इकाइयों और विभिन्न देशों के कैथोलिक चर्च इकाइयों में अंदर ही अंदर आग धधक रही है। कैथोलिक चर्च की छवि बचाने के लिए कुर्बानी देने के सिद्धात पर जोर दिया जा रहा है। जर्मन रोमन चर्च ने भी पोप बेनेडिक्ट सोलहवें के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। जर्मन रोमन चर्च का कहना है कि वेटिकन सिटी और पोप बेनेडिक्ट ने यौन उत्पीड़न के शिकार बच्चों और उनके परिजनो के लिए कुछ नहीं किया है। वेटिकन सिटी में भी यौन शोषण के शिकार बच्चों के परिजनों ने प्रदर्शन और प्रेसवार्ता कर पोप बेनेडिक्ट के आचरणों की निंदा करने के साथ ही साथ न्याय का सामना करने के लिए ललकारा है। दलदल में कैथोलिक चर्च आरएल फ्रांसिस। आजकल कैथोलिक धर्मासन पर विराजमान लोग गहन चिंतन में पड़े हुए हैं। उनकी चिंता का मुख्य कारण है वर्तमान चर्च के 'पुरोहितों में व्याप्त यौनाचार'। पुरोहितों में यौन कुंठाओं के पनपते रहने से वे मानसिक रूप से चर्च की अनिवार्य सेवाओं से मुंह मोड़ने लगे हैं। इसका असर कैथोलिक विश्वासियों में बढ़ते आक्रोश के रूप में देखा जा सकता है। विश्वासियों द्वारा चर्च की मर्यादाओं को बरकरार रखने की माग बढ़ती जा रही है और इस आदोलन ने अंतरराष्ट्रीय स्वरूप हासिल कर लिया है। इस आदोलन में कैथोलिक युवा वर्ग अग्रणी भूमिका निभा रहा है। अमेरिका के रोमन कैथोलिक चर्च के छह करोड़ 30 लाख अनुयायी हैं यानी अमेरिका की कुल जनसंख्या का एक चौथाई भाग कैथोलिक अनुयायियों का है। साथ ही यहा के बिशपों एवं कार्डीनलों का वेटिकन [पोप] पर सबसे अधिक प्रभाव है। जब कभी नए पोप का चुनाव होता है तो यहा के कार्डीनलों के प्रभाव को साफ देखा जा सकता है। यहा के कैथोलिक विश्वासी चर्च अधिकारियों की कारगुजारियों के प्रति अधिक सचेत रहते हैं। वर्तमान समय में विश्वभर के कैथोलिक धर्माधिकारियों, पुरोहितों में तीन 'डब्ल्यू' यानी वैल्थ, वाइन एंड वूमेन का बोलबाला है। इस प्रकार का अनाचार कैथोलिक चर्च के अंदर लगातार घर कर रहा है। चारों और से सेक्स स्कैंडलों में घिरते वेटिकन ने अपने बचाव के लिए अमेरिका की यहूदी लाबी और इस्लामिक संगठनों को अपने निशाने पर ले लिया है। अब यह प्रश्न भी उठने लगा है कि वेटिकन एक राज्य है या केवल उपासना पंथ का एक मुख्यालय? क्यों पोप को एक धार्मिक नेता के साथ-साथ राष्ट्राध्यक्ष का दर्जा दिया जाता है? क्यों वेटिकन संयुक्त राष्ट्र संघ में पर्यवेक्षक है? क्यों वेटिकन को दूसरे देशों में अपने राजदूत नियुक्त करने का अधिकार मिला है? क्यों वेटिकन किसी भी देश के कानून से ऊपर है? अब समय आ गया है कि वेटिकन को अपने साम्राज्यवाद को रोककर आत्मशुद्धि की तरफ बढ़ना चाहिए। आतीत में की गई अपनी गलतियों को मानते हुए भविष्य में उसे न दोहराने का कार्य करना चाहिए। अपने को राष्ट्र की बजाय धार्मिक मामलों तक सीमित रखना चाहिए।.......महोदय मे कुछ स्म्यप्रांत इतने सारे प्रमाण प्रस्तुत कर दूंगा की आप स्वयमेव ही सोचने पर बाध्य हो जायेंगे ,,आपकी जानकारी के लिए ........आप एक बार जाकर केरला के ईसायों (दलित ईसायों के मध्य जाकर उनसे उनका हाल पूछिए ,,अगर नही पूछ सकते तो मे आपको वीडियो उपलब्ध करवा दूंगा कि ईसाईयों के द्वारा ईसाई बनने के उपरान्त उनके वह आपकी भाषा में उद्धारक उनसे क्या व्यवहार कर रहे हैं ,,वह अब न इधर के रहे न उधर के ,,,रही बात आपके संस्था की तो भारत में ऐसी हिन्दू संस्थायों का शायद आपको ज्ञान ही नही है ,,(सावन के अंधे को हरा ही हरा नजर आता है ) जो सम्पूर्ण विश्व में अनवरत सेवा एवं उत्थान के लिए आत्मोसर्ग कर रही हैं ........मे आशा करता हूँ आप से पुनः मुलाक़ात नही होगी ,,और जाती सूचक का प्रयोग न करें तो बेहतर होगा ,,बेवजह की अग्नि प्रज्वलित करने से आपका कोइ लाभ नही होने वाला

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\"आप सब किस हिंदुत्व की बात करते है आप ही जाने,लेकिन किसी ध्यान पद्धति का केवल इसलिए विरोध किया जाये कि उसमें क्रूस का प्रयोग किया गया है यह कितना हिन्दू वादी है आप सब ही निर्णय कर लें। हमारी संस्कृति असंख्य दैवीय व् ध्यान प्रतीकों से भरी पड़ी है। क्रूस से भयभीत होने का कोई कारण नहीं है । . प्रिय डेनियल, बड़ी खुशी हुयी ये जानकर की आप सभी धर्मों का बहुत सम्मान करते हैं लेकिन क्या आप इस सत्य को भी स्वीकार करेंगे की भारत में आदिवासियों का बड़े पैमाने पर धर्मान्तरण किया जा रहा है. कुछ प्रश्न करना चाहता हूँ. उम्मीद है की जवाब मिलेगा. १. धर्मान्तरण से किसी देश पर क्या विपरीत प्रभाव पड़ते हैं. २. क्या कोई एक धर्म सबसे अच्छा हो सकता है. ३. क्या किसी देश की मूल संस्कृति को विदेशी संस्कृति के द्वारा नष्ट किया जाना चाहिए. . प्रश्न ढेरों हैं आप उत्तर देते रहिये मैं पूंछता रहूँगा. प्रिय डेनियल भारत तो अध्यात्म का देश रहा है. यहाँ हर व्यक्ति अध्यात्मिक है. लेकिन हम अपना अध्यात्म किसी पर थोपते नहीं हैं. मित्र हमारे अध्यात्मिक अनुभव भी कम नहीं है. हम भारतवासी भी सभी प्राणियों में एक ईश्वर को देखते हैं. यहाँ तक की पूरे ब्रह्मांड में सिर्फ एक ईश्वर तत्व को ही मानते हैं. लेकिन क्या फिर हम जिस मिटटी में पैदा हुए हैं उसके प्रति अपने फर्ज को भुला दें. परमेश्वर श्री कृष्ण ने हमें कर्म करने का सन्देश दिया है. हमारा कर्मों में हमारी मात्रभूमि की शत्रुओं से रक्षा भी आती है. अध्यात्म की शुरुआत ही भारत से हुयी आप तो जानते ही है जैसा की अपने ऊपर लिखा है और अपने भारत का इतिहास भी पढ़ा होगा. जब ईसा थे न मूसा थे उसके भी बहुत पहले यहाँ ईश्वरीय वाणी गूंजती थी. वेद, उपनिषद, वेदांगों के बारे में भी अपने पढ़ा होगा, इस भूमि पर अवतरित होने वाले अवतारों के भी बारे में अपने पढ़ा होगा. तब आप स्वयंम जानते होंगे की मूल कौन है और बाद में आने वाले और उनका दुनिया के दुसरे कोनों में अनुसरण करने वाले कौन थे. उम्मीद करता हूँ की आप देशहित में सोचेगें और विदेशी संस्कृति को बढ़ावा नहीं देंगे.

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मित्रों ! क्रूस एक अत्यंत शक्तिशाली प्रतीक है जो मानसिक और आत्मिक स्तर पर परिवर्तन लाने वाले प्रभाव उत्पन्न करता है । हम अपने आस पास दैवीय प्रकृति के बहुत सारे प्रतीकों को देखते है, किन्तु क्रूस अपने आप में एक विलक्षणतम प्रतीक है । इसकी विशेषताएं जो इसे विलक्षणतम प्रतीक बनती है इस प्रकार है:~ १.यह प्रतीक है ईश्वर के मनुष्य के प्रति प्रेम की पराकाष्ठा का , जहाँ उसके द्वारा मनुष्य रूप लेकर स्वयं अपना ही बलिदान कर दिया जाता है अर्थात क्रूस पर यीशु की मृत्यु। ईश्वर के इस अलौकिक प्रेम को पूरे ब्रह्मांड में केवल एक प्रतीक, क्रूस ही दर्शाता है । बहुत से लोगों की यह धारणा है कि यीशु को पापियों ने क्रूस पर चढ़ा कर मार डाला था, लेकिन यह पूर्ण सत्य नहीं है । यीशु का पृथ्वी पर आना और क्रूस पर बलिदान होना ईश्वर द्वारा बनाई गई उस महानतम योजना का एक भाग था, जिसका उद्देश्य सभी पापियों के लिए उद्धार का मार्ग प्रशस्त करना था । ईश्वर कहता है कि हर मनुष्य जन्म से ही पापी है, और उसके सब भले कर्म उसे धर्मी नहीं बना सकते । क्योकि पाप मनुष्य के रक्त में समाहित हो चुका है , जो माता पिता से उनकी संतानों में पहुँच जाता है। इस कारण मनुष्य स्वभाव से ही पापी होता है । ईश्वर का नियम है कि हर व्यक्ति जिसने पाप किया है वह ईश्वरीय दंड का पात्र है । इस प्रकार संसार के प्रत्येक मनुष्य के लिए दंड मिलना ज़रूरी हो जाता है । यीशु ईश्वर के इस नियम को पूर्ण करने के लिए अंतिम दंड (मृत्यु )को स्वयं भोगते है । अर्थात वह दंड जो संसार के सभी मनुष्यों को मिलना था, उस दंड को अपने ऊपर लेकर सभी मनुष्यों को दंड की आज्ञा से मुक्त कर देते है। २.यह प्रतीक है ईश्वर द्वारा संसार के सभी मनुष्यों को क्षमा प्रदान करने का। यीशु संसार में धर्म या धर्मियों की रक्षा के लिए नहीं आये थे, वे संसार में पापियों को दंड से बचाने अर्थात उन्हें क्षमा दिलाने के लिए आये थे और उन्होंने संसार का दंड अपने ऊपर लेकर संसार के सभी मनुष्यों के लिए क्षमा द्वारा उद्धार का मार्ग सदैव के लिए खोल दिया । यीशु के आने से पहले संसार के किसी भी धर्म ग्रन्थ में पापों की क्षमा का कोई विकल्प नहीं मिलता। यीशु संसार के सभी पापियों के लिए उनके पाप कर्मों का फल भुगतने की अनिवार्यता समाप्त कर देते है। वे हर प्रकार के पापों को ईश्वर द्वारा क्षमा किये जाने का मार्ग तैयार कर देते है । यह प्रतीक ईश्वर द्वारा मनुष्य के हर प्रकार के पाप को क्षमा करने का प्रतीक है। ३.यह प्रतीक है परमेश्वर के साथ निकटतम सम्बन्ध स्थपित होने का। यीशु न केवल स्वयं को ईश्वर का पुत्र घोषित करते है, बल्कि संसार के सभी मनुष्यों को ईश्वर का पुत्र /पुत्री होने का अधिकार प्रदान करते है । यीशु के संसार में अवतरित होने के पूर्व ईश्वर से मनुष्य का सम्बन्ध, सृष्टिकर्ता से उसकी सृष्टि का सम्बन्ध, प्रभु से उसके भक्त का सम्बन्ध था। यीशु इस सम्बन्ध को पिता और उसके पुत्र /पुत्री के सम्बन्ध में बदल देते है। संसार का कोई भी सम्बन्ध उतना आत्मीय व् निकट नहीं है जितना पिता का पुत्र /पुत्री से है । क्रूस ईश्वर से निकटतम सम्बन्ध स्थापित होने का प्रतीक है । ४.क्रूस प्रतीक है अनुग्रह का ! अनुग्रह वह कृपा है जो यीशु के माध्यम से ईश्वर हमें प्रदान करते है । अनुग्रह के द्वारा ही हम अपने पाप के कामों से मुक्त हो कर धर्मी ठहरते है। अनुग्रह के द्वारा ही अयोग्य होने पर भी हमें योग्यता प्रदान की जाती है। अनुग्रह के द्वारा ही हम अपने स्वाभाविक पाप के कामों को छोड़ पाते है और आत्मिक उन्नति करने की क्षमता प्राप्त करते है । अनुग्रह के द्वारा ही हमारे सारे पाप सदैव के लिए ढांप दिए जाते है। अनुग्रह के द्वारा ही मृत्यु के पूर्व ही हमें नया जन्म मिलता है और अनुग्रह के कारण ही हम पर दंड की आज्ञा नहीं होती । (यह सारी वस्तुएं आपके लिंक से ही मे यहाँ लेकर आया हूँ ,,क्या यह धर्म प्रचार नही है ?) प्रिय डेनियल जी ,,शायद आप मन से हिन्दू ,वाणी से ईसाई एवं कर्म से भी ईसाई ,,और मे दो नाव के पथिक के साथ नही रहता प्रत्युत्तर में शायद आप यह कहें की मे केवल एक नाव का पथिक हूँ ,तो मित्र मेरे मे क्लोनिंग का भी पक्छ्धर नही हूँ ,जिस धर्म या जाति में मे पैदा हुआ उसी में मेरा अंत होगा ,दुराग्रह किसी से नही करता हूँ लेकिन धर्म प्रचार का सदैव विरोध करता हूँ और यह भारत भूमि की ही देन है की आप यहाँ पर शब्दों को शहद में लपेटकर बड़े ही सोम्य भाव से धर्म प्रचार करते रहें जिस तरह मिशनरियां करती हैं और उनके पूर्वज जो व्यापार करने भारत भूमि पर आये और इसके बहाने क्या क्या किया यह सभी भारतीयों को अच्छी तरह पता है ,सहिष्णुता बहुत अच्छी विचार धारा है लेकिन अपनी मात्री भूमि को बेंचकर नही ,,बेचारे वनवासी जो मानसिक स्थिति से आप लोगों जितने प्रबुध्ध नही होते यह हथकंडे अगर आप वहीं आजमायें तो बेहतर होगा ......हो सकता है भविष्य में पुनः आपसे मुलाक़ात हो ........जय भारत

के द्वारा:

मित्रों आप सभी टिपण्णी कर्ताओं की चिंताएं वास्तविक नहीं, केवल मनोवैज्ञानिक है। मैं आप सभी को बताना चाह्ता हूँ कि मैंने लम्बे समय तक गायत्री मंत्र व् सूर्य-गायत्री मंत्र का जाप किया है । सूर्य मन्त्र व् चन्द्र मंत्र को विधि पूर्वक सिद्ध किया है तो क्या मैं हिन्दू हो गया ? क्या मेरा धर्म परिवर्तन हो गया ? भ्रामरी प्राणायाम करते समय जो लोग ओम का उच्चारण करते हैं तो क्या वे सब हिन्दू बन जाते है ? जब मैं ओम का उच्चारण करता हूँ तो मेरा लक्ष्य बिलकुल ही स्पष्ट होता है और मेरी शारीरिक और मानसिक गतिविधियाँ हिन्दू या इसाई धर्म से बिना प्रभावित हुए अपना कार्य करती है । विपश्यना ध्यान केंद्र लखनऊ में मैंने विपश्यना और डिवाइन रेकी सेंटर कानपुर से रेकी सीखी। बिना किसी पूर्वाग्रह के रेकी के तीनों प्रतीकों हान-शा-ज़े-शो-नेन, चो-कु-रेई व् से-हे-कि को सीखा और आज भी उनका अभ्यास करता हूँ। विपश्यना और रेकी दोनों ही बौद्ध धर्म से सम्बंधित हैं लेकिन मुझे कभी भी इससे कोई चिंता या समस्या नहीं हुई और मैं बौद्ध नहीं बन गया। मेरे सभी जानने वाले मुझे एक ईसाई के रूप में ही जानते है और सदैव के इसाई रूप में ही जानेंगे। निश्चित ही मेरे उक्त अनुभवों से मेरा धर्म परिवर्तन नहीं हुआ, किन्तु मेरी विचार धारा पूरी तरह परिवर्तित हो चुकी है । मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं कि मैं विचारधारा से निश्चित ही एक हिन्दू हूँ क्योकि यह सहिष्णु है, इसमें एकता में अनेकता है। गरुण और सर्प विरोधी है लेकिन दोनों की पूजा संभव है। यहाँ ३३ करोड़ देवी देवता है कुछ बढ़ जाये तो कोई फर्क नहीं साकार रूप में राम , कृष्ण आदि को अपना आराध्य मानें तो भी हिन्दू और निर्गुण निराकार ब्रह्म को मानें तो भी हिन्दू । भक्ति मार्ग भी रहेगा और ज्ञान मार्ग भी। हिन्दू विचारधारा में संकीर्णता का कोई स्थान नहीं है । हमने ईरान से आये पारसियों को इस तरह स्वीकारा कि वे हममें बिलकुल घुल मिल गए। हमने जिन(जैन) विचारधारा को संरक्षण दिया जहाँ ईश्वर का कोई महत्त्व ही नहीं रह जाता । आप सब किस हिंदुत्व की बात करते है आप ही जाने,लेकिन किसी ध्यान पद्धति का केवल इसलिए विरोध किया जाये कि उसमें क्रूस का प्रयोग किया गया है यह कितना हिन्दू वादी है आप सब ही निर्णय कर लें। हमारी संस्कृति असंख्य दैवीय व् ध्यान प्रतीकों से भरी पड़ी है। क्रूस से भयभीत होने का कोई कारण नहीं है । ***शुभकामनाओं सहित***

के द्वारा: daniel daniel

प्रिय डैनियल, जय श्री राम । आपने बहुत ही अच्छी जानकारी दी है । हमारे सनातन धर्म में बहुत से महापुरूषों ने इसका जिक्र किया है । ऊपर बताये सातों चक्रों को भेदने के कुछ कठिन रास्ते भी है और कुछ बेहद आसान रास्ते भी । कठिन रास्तों में हठ योग है और बेहद आसान रास्तों में प्रेम और भक्ति का मार्ग है । जिसे भारतवर्ष में क्रम से आये सैंकड़ों संतों ने बताया और दिखाया है । सबसे पहले तो यह रास्ता योगेश्वर श्रीकृष्ण ने गीता में अर्जुन को दिखाया । देखें गीता अध्याय 18 श्लोक 65 मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु । मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे ॥ श्री कृष्ण ने अर्जुन से कहा कि अगर तुम यह सब कुछ भी नहीं कर सकते हो तुम बस मेरी शरण में आ जाओ मैं तुम्हें सभी पापों से मुक्त कर दूंगा । इससे बड़ा शार्टकट और क्या हो सकता है जहां परमेश्वर खुद मुक्ति की गारंटी दे रहा हो । प्रेम और भक्ति का मार्ग सबसे बड़ा शार्टकट है । यही सूर, तुलसी, कबीर, मीरा, रैदास, वल्लभाचार्य, चैतन्य महाप्रभू, एकनाथ आदि ने बताया । . श्री कृष्ण ने भगवत् गीता में कई बार कहा है कि मेरी शरण में आने पर मैं महापापियों में भी महापापी के पाप माफ कर उसे अपनी गति देता हूं । सैंकड़ों नहीं हजारों हजारों उदाहरण भरे पड़े हैं । . एक आसान रास्ता आपने बताया और मैं उस वेबसाईट पर भी गया जिसका आपने जिक्र किया है । लेकिन मित्र एक बात बुरी तरह खटकती है कि आप अपने अध्यात्मिक अनुभवों के बहाने ईसाईयत को अपनाने पर चुपके से बल देते हैं । आपकी बताई साईट से कुछ पंक्तियां लेकर यहां पेस्ट कर रहा हूं । . मै जन्म से ही पापी हूँ । मैं जाने अनजाने में अपने कर्मों एवं विचारों द्वारा अनेक प्रकार से पाप में संलग्न रहा हूँ । किन्तु हे प्रभु ! अपने संसार के सभी पापियों पर दया क़ी है । अपने न केवल हम पर दया ही क़ी है बल्कि हमसे ऐसा प्रेम किया कि हमारे पापों की क्षमा के लिए अपने आप को बलिदान कर क्रूस पर पीड़ादायक मृत्यु को भी सहा । हे प्रभु ! आपकी दया, प्रेम और हमारे पापों की क्षमा के लिए मैं आपका ह्रदय से कृतज्ञ हूँ ।मैं अपने ह्रदय को आपके सम्मुख खोलते हुए आपके प्रेम, क्षमा व् बलिदान के प्रतीक क्रूस को अपने ह्रदय में धारण करता हूँ । . जब भारत में ईसाईयत से भी बहुत पुराना हमारा अपना मूल आध्यात्मिक ज्ञान है तब हम एक विदेशी धर्म और एक ऐसा धर्म जो कि पैसे के बल पर दूसरे लचीले धर्मों के अनुयायियों को ईसाई बनने पर जोर देता है, जिसके खिलाफ भारत का स्वतंत्रता संग्राम लड़ा गया, उसे हम क्यों अपनाये । क्या हमारे सनातन धर्म में दिये गये सिद्धांत, हमारे महापुरूष, अवतार कम पड़ गये हैं जो हम इनका आयात बाहर से करें । फिर हिंदू धर्म सभी धर्मों का मूल है । सबसे पुराना धर्म है । जीयो और जीने दो की बात करता है । सबसे महान धर्म है उसे छोड़ कर क्यों हम दूसरे धर्मों की तरफ देखें । हम किसी भी धर्म का अपमान नहीं करते, सबको भारत में प्रचार का अधिकार है लेकिन धन का लालच देकर या मूर्ख बनाकर, या बलात धर्मपरिवर्तन का विरोध भारत का संविधान भी करता है और मैं भी करता हूं । . ग्राहम स्टैंस के हत्यारे दारा सिंह की अपील पर सुप्रीम कोर्ट ने ये टिप्पणी भी की है कि हर अपराध के पीछे कोयी न कोयी मकसद होता है । ऐसी क्या बात थी कि दारा सिंह ने ग्राहम स्टैंस को उसके बच्चों के साथ कार में जिंदा जला दिया । उसके पीछे की कहानी यह है कि ग्राहम स्टैंस उस इलाके में बिना सरकार को सूचना दिये आदिवासियों को धन का लालच देकर उनका धर्मपरिवर्तन कराता था । इसके अलावा उसके ऊपर बालयौन शौषण के भी आरोप थे । . स्वामी असीमानंद को फर्जी समझौता ब्लास्ट मामले में लपेटा गया जिसको कि सिमी चीफ पहले ही अपने नार्को टेस्ट में कुबूल चुका है । स्वामी असीमानंद जंगलों में अदिवासियों के उद्धार के लिये कार्यकªम चलाते हैं जिससे चर्च के धर्मांतरण के कार्यकªम में रूकावट आयी और तब वेटिकन की एजेंट सोनिया गांधी और राहुल गांधी के इशारे पर स्वामी असीमानंद को हिंदू आतंकवाद में लपेट लिया गया । अब स्वामी असीमानंद ने कोर्ट के सामने कहा है कि उससे सीबीआई और एन आई ए ने वह सब जबरदस्ती, अमानवीय तरीके से कुबुलवाया था जो कि झूठ था । . तो मित्र अब सुनो धर्मपरिवर्तन से किसी राष्ट्र का किस तरह बेड़ा गर्क होता है । पिछले 1500 सालों का विश्व इतिहास उठाकर देखो तो विश्वराजनीति इस्लाम और ईसाईयत के बीच झूल रही है । इन दोनों धर्मों ने पूरे विश्व पर कब्जे के लिये हर तरह के प्रसास किये । वो तलवार के जोर पर धर्मपरिवर्तन कराते थे आप पैसे और सेवा के बल करा रहे हैं । जब किसी राष्ट्र मंे धर्मपरिवर्तन बड़े पैमाने पर होता है तो उस राष्ट्र का चरित्र, नीति और भौगोलिक सीमाएं बदल जाती हैं । यह सब विश्वराजनीति के अंतरगत एक बड़े सुनियोजित षडयंत्र के तहत पिछले 1500 साल से चल रहा है । पाकिस्तान इसका सबसे बड़ा उदाहरण है । कश्मीर मंे स्वायत्ता की मांग देखिये । आज असम और बंगाल के चुनाव में घुसपैठी बंग्लादेशी सबसे निर्णायक भूमिका निभाने जा रहे हैं जिन्हें वहां की सरकार ने भारत का नागरिक बना दिया है । जबकि सुप्रीम कोर्ट ने इस घुसपैठ को अपने एक निर्णये में भारत पर हमला बताया था । चर्च में क्या क्या अनैतिक काम होता है वह आज किसी से छिपा नहीं है । चर्च के पादरियों द्वारा यौन शौषण और बालयौन शौषण के मामले भी इसी नेट पर बहुत हैं । आप कहेंगे तो तमाम लिंक दे दंूगा । . मित्र जो गलती आपके पूर्वजों ने की है आप उसे क्यों दुहराना चाह रहे हैं । भारत की महान संस्कृति, परंपरा, पूरे विश्व को प्रकाशित करने वाले अध्यात्मिक ज्ञान को छोड़ कर आप आज ईसाईयत की माला जप रहे हैं और देश तोड़ने का काम कर रहे हैं । मैं अगर गलत कह रहा हूं तो महात्मा गांधी, दयानंद सरस्वती, विवेकानंद, डा0 भीमराव अंबेडकर, सरदार पटेल तो झूठ नहीं बोल रहे थे । कहिये तो सबको एक एक कर उद्धृत करता चलूं कि सेमेटिक धर्मों ने भारत पर रंगरूप बदल कर बार बार आक्रमण किये हैं और आज भी वो भारत पर आक्रमण कर रहे हैं । उम्मीद है कि आप ईसाईयत के अध्यात्म से राष्ट्रधर्म को बड़ा मानेंगे ।

के द्वारा:

भारत में आज बहुत ही खतरनाक स्थिति बनती जा रही है अपने हिन्दूराष्ट्र भारत में विदेशी संस्कृति से प्रेरित मीडिया, खुद को सैकुलर कहलवाने वाले राजनीतिक दलों, बिके हुए देशद्रोही मानवाधिकार संगठनों, खुद को सामाजिक कार्यकर्त्ता कहलवाने वाले गद्दारों, आतंकवादियों व परजीवी हिन्दुविरोधी लेखकों का एक ऐसा सेकुलर गिरोह बन चुका है जो भारत को सांस्कृतिक व आर्थिक रूप से तबाह करने पर आमादा है। इस गिरोह को हर उस बात से नफरत है जिसमें भारतीय संस्कृति व राष्ट्रवाद का जरा सा भी अंश शेष है । यह गिरोह हर उस बात का समर्थन करता है जो देशद्रोही कहते या करते हैं । यह गिरोह देश की रक्षा के लिए जान खतरे में डालकर जिहादी आतंकवादियों का सामना करने वाले देशभक्त बहादुरों से अपराधियों जैसा व्यवहार कर रहा है और न जानें उनके लिए क्या-क्या अपशब्द प्रयोग रहा है। देशद्रोही जिहादियों व अन्य आतंकवादियों को बेचारा गरीब अनपढ़ व सत्ताया हुआ बताकर हीरो बनाता जा रहा है । सेवा के नाम पर छल कपट और अवैध धन का उपयोग कर भोले-भाले बनवासी हिन्दुओं को गुमराह कर उनमें असभ्य पशुतुल्य विदेशी सोच का संचार कर हिन्दुविरोधी-राष्ट्रविरोधी मानसिकता का निर्माण करने वाले धर्मान्तरण के ठेकेदारों को हर तरह का सहयोग देकर देश की आत्मा हिन्दू संस्कृति को तार-तार करने में जुटा है। यह गिरोह एक ऐसा तानाबाना बुन चुका है जिसे हर झूठ को सच व हर सच को झूठ प्रचारित करने में महारत हासिल है।परपूजनीय सन्त श्री लक्ष्मणानन्द जी का कत्ल अगर ये ईसाई मिशनरी न करते तो शायद बनवासी हिन्दू समाज का धैर्य न टूटता । जैसे देश के अन्य हिस्सों में हिन्दू समाज व हिन्दू संगठन ईसाई मिशनरियों के अत्याचार सह रहे हैं अनका गाली गलौच, भारतीय संस्कृति व हिन्दू समाज की घोर निन्दा वो भी असंसदीय भाषा में, सहन कर रहे हैं कंधमाल में भी करते रहते। परन्तु कत्ल सहने का धैर्य अब जबाब दे चुका है वो भी उस निहत्थे परपूजनीय सन्त व उनके सहयोगियों का जो दिन-रात बनवासियों की निस्वार्थ सेवा में लगे हुए थे । उन्हें चर्च ने इसलिए कत्ल करवा दिया कि वो धर्मांतरण का विरोध करते थे । कौन सहन करेगा इस साम्राज्यवादी सोच को ? क्यों सहन करेगा ? कब तक सहन करेगा ? हमारा देश हमारे लोग हमारी जमीन और हमारे पर ही आक्रमण और वो भी उन सम्राज्यवादी ईसाई मिशनरियों का जो 1600ई. में व्यापारियों के भेष में आए और हिन्दुओं के बीच फूट डलवाकर 300 वर्ष तक भारतीय अर्थव्यवस्था व संस्कृति को तहस नहस करते रहे और देशभक्त हिन्दुओं को मौत के घाट उतारते रहे और अब ईसाई मिशनरियों के रूप में आकर धर्मांतरण करवाकर हिन्दुओं के बीच फूट डलवाने का असफल प्रयास कर रहे हैं । परन्तु इनको यह नहीं भूलना चाहिए कि ये महारानी लक्ष्मीबाई व भगत सिंह का देश जलियांवाला बाग में ईसाई मिशनरी डायर द्वारा मचाई गई मार काट को अभी तक नहीं भूला है और न भूलेगा इसलिए ईसाई मिशनरियों को 16वीं शताब्दी की मानसिकता समय रहते त्याग देनी चाहिए या फिर परिणाम भुगतने के लिए तैयार हो जाना चाहिए हिन्दू समाज धर्मांतरण के ठेकेदारों को बख्शेगा नहीं । परमपूजनीय सन्त लक्ष्मणानन्द जी के ऊपर ईसाई मिशनरियों का ये दसवां हमला था । इनकी दुष्टता की पराकाष्ठा देखो हमले के स्थान पर जो चिट्ठी छोड़ी उसमें लिखते हैं कि क्योंकि हम भारत को सैकुलर बोले तो हिन्दुविहीन बनाना चाहते हैं इस लिए हमने स्वामी जी का कत्ल किया । कौन राष्ट्रभक्त हिन्दू इस दुष्टता को सहन कर सकता है जब इनकी दुष्टता का जबाब इन्हीं के तरीके से मिलने लगा तो शोर मचा दिया कि स्वामी जी का कत्ल माओवादियों ने किया है फिर माओवादियों को पैसा देकर उनका ब्यान दिलबा दिया वरना माओवादियों को क्या जरूरत पड़ी थी उस कत्ल की जिम्मेवारी लेने की जो उनकी सोच से मेल नहीं खाता । पता तो उन अपराधीयों का लगाया जाना चाहिए जिन्होंने माओवादियों से यह झूठा ब्यान दिलवाया जांच एजैंसियों व हिन्दुओं को गुमराहकर धर्मांतरण के ठेकेदारों को निर्दोष सिद्ध करने के लिए और उनका भी जो ईसाई देशों में इस झूठ को फैलाकर हिन्दुस्थान को बदनाम कर देशद्रोही कामों को अन्जाम देने के लिए धनसंग्रह कर रहे हैं। मीडिया के उन गद्दारों का भी पता लगाया जाना चाहिए जो बार-बार हिन्दुविरोधी दुष्प्रचार कर हिन्दुओं व हिन्दुस्थान को बदनाम कर अपनी जेबें भर रहे हैं ।

के द्वारा:

आदरणीय दानिएल जी कृपया मेरी बेबाक टिपण्णी को अन्यथा न लें --------------------------------- समझ से परे चिंतन है आपका ...........सर्व प्रथम तो आपको अहंकार शब्द का शाब्दिक अर्थ पता होना चाहिए .........घमंड का अर्थ है उस बात पर अभिमान होना जो हमारे पास नहीं है ,,,,,,,,,,,,ठीक इसके विपरीत आत्म-सम्मान का अभिप्राय है अपनी अच्छाइयों पर गर्व .......रावन अहंकारी था क्योंकि वह सर्वशक्तिमान नहीं था किन्तु अपने आप को समझ बैठा था ...अतः उसकी शारीरिक एवं आध्यात्मिक हर प्रकार से अवनति हुई ......रही बात क्षमा की तो हरेक इंसान को इश्वर की संतान माने,,,,मेरा दावा है की किसी को गुनाहगार नहीं मानेंगे ,,,,,,,,आत्मावलोकन करेंगे तो खुद को ही कोसेंगे .......स्वयं को ज्ञानी मान लेने से ही कोई ज्ञानी नहीं हो जाता ..........यहाँ इस बात का भी ध्यान रखना पड़ता है की कौन सा कृत्या क्षमा के योग्य है ..........सामजिक हितों को ठेस पहुंचाने वालों अथवा आराजक तत्वों को क्षमा करना सही नागरिकों के साथ अन्याय के सामान है .........अतः मेरी गुजारिश है की विद्वानों की बात मान लें और वास्तविकता को स्वीकारें | जय हिंद !!!

के द्वारा: baijnathpandey baijnathpandey

धन्यवाद पियूष जी ! केवल बधाई से काम नहीं चलेगा , अरमान ट्रस्ट को मेल किया कि नहीं ? अगर नहीं किया हो तो मेल करके औषधि मँगा ले। अपने घर पर रक्खें और मित्रों को भी दें । एक बार मैं अपने घर पर कमरे में सीढ़ी लगा कर कुछ काम कर रहा था । अचानक सीढ़ी फिसल गई और मैं दीवार से रगड़ खाता हुआ नीचे आ गिरा । मेरी हथेलियाँ और कंधे और सीने का कुछ हिस्सा बुरी तरह दीवार से रगड़ खा गया। मैंने तुरंत ही एक चम्मच तेल में औषधि की तीन चार बूंदें मिला कर लगा लीं। तीन दिनों में ही मेरी चोट पूरी तरह ठीक हो गई और पपड़ी हटने के बाद शारीर पर कोई निशान भी नहीं बचा। इस औषधि का मै अक्सर प्रयोग करता हूँ और इसके परिणाम किसी भी अन्य औषधि से बहुत अच्छे होते हैं ।

के द्वारा: daniel daniel

प्रिय पियूष जी ! विलम्ब से उत्तर देने के लिए क्षमा प्रार्थी हूँ . सबसे पहले मैं आपको बताना चाहूँगा कि इस पोस्ट के द्वारा ईसाई धर्म के प्रमुख किन्तु गूढ़ सिद्धांत को अपने शब्दों में आप लोंगों के सामने रखने का प्रयास किया गया है इस पोस्ट में मैंने अपनी ओर से या कोई निजी विचार नहीं रखा है बाइबल के अनुसार पहले मनुष्य आदम ने परमेश्वर की आज्ञा का उल्लंघन किया जिसके कारण समस्त मानव जाति पाप में पड़ गई . पाप का फल भुगतना अनिवार्य है अतः मनुष्य के पापो का फल स्वयं ही भुगतने के लिए परमेश्वर ने अपने पुत्र यीशु को संसार में भेजा कि वह यहाँ आकर अपना बलिदान दे और मनुष्यों को दंड की आज्ञा से मुक्त करे बाइबल के कुछ सम्बंधित सन्दर्भ इस प्रकार है ~ १.भजन संहिता ५१:५ \"मैं पाप से जन्मा , मेरी माता ने मुझको पाप से गर्भ में धारण किया\" २.रोमियों ५:१२ \"इसलिए जैसा एक मनुष्य के द्वारा पाप जगत में आया , और पाप के द्वारा मृत्यु आई , और इस रीती से मृत्यु सब मनुष्यों मैं फ़ैल गई\" ३.रोमियों ५:८ \"परन्तु परमेश्वर हम पर अपने प्रेम की भलाई इस प्रकार प्रकट करता है कि जब हम पापी ही थे तभी मसीह (यीशु )हमारे लिए मरा\" मित्र ! क्षमा के सम्बन्ध में मैं कहना चाहूँगा कि हिन्दू धर्म में कर्म फल प्राप्ति का सिद्धांत ही प्रमुख है पापों की क्षमा का कोई सिद्धांत नहीं है जहाँ तक संतों द्वारा क्षमा करने का प्रश्न है संत पाप नहीं क्षमा कर सकते. यदि किसी ने उनके विरुद्ध कोई अपराध या उनकी हानि की हो तो उसे क्षमा करना पाप क्षमा करना नहीं है .पाप क्षमा करना मनुष्य के अधिकार क्षेत्र में नहीं अपितु इश्वर के अधिकार क्षेत्र में है .. ***शुभकामनाएं ***

के द्वारा: daniel daniel

daniel जी.......... क्षमा चाहता हूँ किन्तु इस लेख को पढ़ कर कुछ भ्रमित हो गया हूँ......... आपने कहा है की ................ हर मनुष्य जन्म से ही पापी है, और उसके सब भले कर्म उसे धर्मी नहीं बना सकते । क्योकि पाप मनुष्य के रक्त में समाहित हो चुका है , जो माता पिता से उनकी संतानों में पहुँच जाता है। तो ये बात तो मनुष्य को और भी अधर्मी बनने की और प्रेरित करेगी........ क्योकि वो तो जन्म से पापी है......... मेरा मन्ना है.......की जन्म से तो केवल इंसान ही हुआ जा सकता है ........... और जहाँ तक आपका ये कथन है की यीशु के आने से पहले संसार के किसी भी धर्म ग्रन्थ में पापों की क्षमा का कोई विकल्प नहीं मिलता। तो हिन्दू धर्म तो यीशु से भी कई सदियों पूर्व से क्षमा को संतो का गुण बता चूका है........... हमारे धर्म ग्रन्थ उद्घोष करते हैं की क्षमा बड़ेन को चाहिए छोटन को उत्पात....... कृपया शंका समाधान करें.............

के द्वारा: Piyush Pant, Haldwani Piyush Pant, Haldwani

प्रिय पियूष जी ! नमस्कार !! हिमांशु जी की दूसरी प्रतिक्रिया का उत्तर देने की आवश्यकता नहीं रह गई थी क्योकि हिमांशु जी over react कर रहे थे, साथ ही साथ उनका attitude ( मुझे ऐसा लगा ) किसी बात को समझने का न हो कर केवल कमी निकलने की ओर अगसर हो चुका था ! जब तक व्यक्ति स्वयं समझने को तैयार न हो, उसे ऐसे विषय में समझाया नहीं जा सकता है, फिर भी हिमांशु जी के द्वारा उठाये गए प्रश्नों के उत्तर प्रस्तुत करना मेरा दायित्व है ! यदि इस स्थान पर उनके प्रश्नों का उत्तर दूंगा तो यह संभवतः अनावश्यक तर्क वितर्क को बढा दे अतः बिना किसी का नाम लिए अपने नए ब्लॉग में उन सभी प्रश्नों के समाधान का प्रयास करूँगा जिन्हें विगत में पाठकों द्वारा उठाया गया है ! ***शुभकामनाएं ***

के द्वारा: daniel daniel

डेनिअल जी आप स्वयं ही अध्यात्मिक विषय पर लेख लिखते हैं फिर यह भी कहते हैं की प्रतिक्रिया आपके अनुरूप हो. एक बात मैं आपको स्पष्ट करना चाहता हूँ की अध्यात्म का ज्ञानी से कोई नाता नहीं है. जहाँ तक आप स्वयं को अध्यात्मिक व्यक्ति मानते हैं तो आपको यह भी स्पष्ट करना चाहूँगा की यदि क्षमा करते हुए हम स्वयं को ज्ञानी और अन्य को अज्ञानी समझे तो यह स्वयं का तुष्टिकरण है. हम किस हेतु किसको क्षमा करते हैं. जो हम क्षमा करने का दावा करते हैं, वह भी अहम् है. क्षमा आप तभी करते हैं जब आपके अहम् को कहीं चोट लगी होती है. अन्यथा क्षमा करने का प्रश्न ही कहाँ है. विचारशून्य होना ही अध्यात्म का उद्देश्य है अतः इतना (मैं फिर स्पष्ठ करना चाहूँगा कि जब आप किसी व्यक्ति को क्षमा नहीं कर पा रहे हों इस कारण क्रोध , बदले की भावना में स्वयं को जला रहे हों तो आपके पास केवल दो ही विकल्प है कि आप अपने मन को शांत कर पायें पहला:~ आप उसे किसी तरह अपना बदला ले लें दूसरा:~ आप उसे क्षमा कर दें) विचार करना व्यर्थ है. जहाँ तक प्रतिक्रिया का प्रश्न है वह पाठकों की निजी राय होती है यदि आप इन प्रतिक्रियाओं पर उद्वलित हो जाते हैं तो यह इंगित करता है की आप अभी परिपक्व नहीं हैं प्रतिक्रिया आपके लेख को और अधिक परिपक्व करती हैं. फिर भी यदि आप आहात हुए हैं तो मुझे भी अज्ञानी और स्वयं को ज्ञानी मानते हुए क्षमा करें. प्रतिक्रिया व्यक्त करने हेतु मैं आपसे क्षमा प्रार्थी हूँ.

के द्वारा: HIMANSHU BHATT HIMANSHU BHATT

प्रिय पियूष जी ! यह लेख उन लोगों के लिए लिखा गया है जो अपनी आत्मिक उन्नति हेतु प्रारंभिक प्रयासों की स्थिति में है इस स्थिति में जो समस्या आती है उसका उल्लेख मैंने इस प्रकार किया था :~ लेकिन एक आम व्यक्ति अपनी हर सांस , प्रति दिन के जीवन के लिए ईश्वर के प्रति सहज रूप से कृतज्ञ नहीं हो पाता और उसे लगता है कि वह ईश्वर के सामने अभिनय कर रहा है । ऐसी स्थिति में वास्तविक भावो के साथ कृतज्ञता अर्पित करने हेतु यह सुझाव दिया गया है ।जैसे आप अच्छे गायक हों , पढाई में अच्छे हों ,रूपवान हों , स्पोर्ट्स में अच्छे हों , शारीरिक बल में श्रेष्ट्र हों या अन्य कोई भी विशेषता , जिस पर आप स्वयं पर घमंड करते हों या कर सकते हों । ............................................इन विशेषताओ के लिए ईश्वर को धन्यवाद् करने का सुझाव दिया गया था । उद्देश्य यह था कि धन्यवाद् या कृतज्ञता अर्पित करते समय उचित भाव भी होने चाहिए । शुरू शुरू में मुझे भी इसी समस्या का सामना करना पड़ता था । मेरे ह्रदय में स्वाभाविक भाव उत्पन्न नहीं हो पाते थे । स्वाभाविक भाव उत्ग्पन्न करने के लिए ही मैंने इस प्रकार की विशेषताओं के लिए धन्यवाद करना शुरू किया । ..........धीरे धीरे अब मैं उस स्थिति की और आ गया हूँ जिसकी चर्चा आपने की है । प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद !!!

के द्वारा: daniel daniel

हिमांशु जी ! आपने यह लेख कितनी गंभीरता से पढ़ा यह तो आप ही जानते है आपका विचार (डेनियल जी यदि मनुष्य को स्वयं के ज्ञानी होने का एवं दुसरे के अज्ञानी होने का अहम् पैदा हो जाये तो इससे बुरी स्थिति और कोई नहीं है,)बिलकुल सही है लेकिन यह मेरे लेख से बिलकुल भी सम्बंधित नहीं है मैं फिर स्पष्ठ करना चाहूँगा कि जब आप किसी व्यक्ति को क्षमा नहीं कर पा रहे हों इस कारण क्रोध , बदले की भावना में स्वयं को जला रहे हों तो आपके पास केवल दो ही विकल्प है कि आप अपने मन को शांत कर पायें पहला:~ आप उसे किसी तरह अपना बदला ले लें दूसरा:~ आप उसे क्षमा कर दें मित्र आप तब तक उसे क्षमा नहीं कर पाएंगे जब तक आप उसे अज्ञानी / नासमझ नहीं मानेंगे एक बात और, लेख में यह बात बहुत ही स्पष्ठ लिखी है कि ऐसा विचार दूसरे को क्षमा करने के उद्देश्य से किया जाना है आपका यह विचार(सांसारिक तर्कों की कसौटी में अध्यात्म की विवेचना नहीं की जा सकती है.) भी बिलकुल सही है इसी लिए आप सभी से अनुरोध किया गया था .......................लेकिन आप सभी से अनुरोध है कि किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने से पूर्व इसका परिक्षण अवश्य करें ।..................... आपकी प्रति क्रिया तार्किक आधार पर दी गई है आप जब तक स्वयं इसका परिक्षण नहीं करते आप इसके प्रभावों को कभी समझ नहीं पाएंगे ***शुभकामनाएं ***

के द्वारा: daniel daniel

वन्दे मातरम बंधुवर, प्रार्थना और भक्ति की शक्ति बेहद शक्तिशाली है....... यही अनुभव मेरे साथ स्वय गुजर चूका है मेरे बेटे के लिए भी अल्ट्रा साउंड मै ऐसा ही कुछ कहा गया था हम भी निराश और गमगीन हो चुके थे ..... तब मेरी माँ ने कहा बेटे तू हनुमान जी को मानता है बाबा से विनती कर सब ठीक होगा ........ मैंने अपने अराध्य के चरणों मैं अपना व अपनी पत्नी का सर रख दिया ....... ये उन्ही का आशीर्वाद है की आज मेरा ये बेटा सवा तीन साल का है .. बेहद चंचल और सुंदर है ....और सभी की आँखोंका तारा है......प्रार्थना मैं बेहद शक्ति है बशर्ते वह सच्चे मन से की जाये ........ यकीने तौर पर प्रार्थना में बहुत शक्ति है, और अगर विश्वास के साथ प्रार्थना की जय तो ये संभव ही नहीं है की वो पूरी न हो.

के द्वारा: rakeshgupta rakeshgupta

प्रिय मित्र अश्विनी ! अपनी पिछली पोस्ट (अहंकार : आध्यात्मिक उन्नति में हमारा सबसे बड़ा सहायक ) में मैंने उल्लेख किया था कि अपने जीवन के लगभग २० वर्ष मैंने ईश्वर की सन्निकटता में नहीं बिताये , लेकिन ऐसा नहीं है कि उस समय मै अपने आपको अधर्मी मानता था।समाज के हर आम व्यक्ति के समान मैं भी अपने को को अच्छा ही समझता रहा और स्वयं में संतुष्ट रहा। बहुत बाद में मुझमे ईश्वर की सन्निकटता के लिए प्यास जगी और मैंने उस प्यास को बुझाने के लिए प्रयत्न करना आरम्भ किया । मित्र अश्वनी ! आपकी वर्तमान विचारधारा और मेरी पूर्व विचारधारा में कोई विशेष अंतर नहीं है। आध्यात्मिक उन्नति के इन प्रयासों के द्वारा मैंने जिन उपलब्धियों को प्राप्त किया है, उनका उल्लेख कर देता हूँ । आप विश्वास करें या न करें - १. एक विशेष प्रकार की शांति का अनुभव होता है, बाइबल में इसका उल्लेख इन शब्दों में किया गया है :~ परमेश्वर की शांति जो सारी समझ से परे है ! २.एक सामान्य व्यक्ति जो अपनी समझ से अपने आपको ईश्वर से निकट ही समझता, दैनिक दिनचर्या में आने वाली समस्याओं के कारण सहज ही चिंता ग्रस्त हो कर तनाव का शिकार हो जाता है किन्तु मैंने इन प्रयासों के द्वारा स्वयं को चिंता व् तनाव से मुक्त कर लिया है। और मैं चाहता हूँ कि मेरे अन्य साथी भी चिंता व् तनाव मुक्त जीवन व्यतीत करना सीखें । ३.आजकल का वातावरण कामुकता से भरा है , बचपन से मैं एक कामुक प्रवृत्ति का व्यक्ति रहा हूँ । कामुक प्रवृत्ति का अर्थ कामुक चिंतन से ही है , मैं सोचता था कि मैं कभी भी इस प्रकार के चिंतन से मुक्त नहीं हो पाऊंग। लेकिन अब मैं प्रभु येशु का बार बार धन्यवाद देता हूँ और देता रहूँगा कि उसने मेरी कामेच्छा को मेरे अधीन कर दिया है । मित्र यह सब उन प्रयासों/विधियों से ही संभव हुआ है जिनका प्रयोग मैं अपनी आध्यात्मिक यात्रा में कर रहा हूँ और एक एक कर आपके साथ बाँट रहा हूँ । ***शुभकामनाओं सहित ***

के द्वारा: daniel daniel

प्रिय मित्र आपकी आध्यात्मिक यात्रा में सदैव ही आपके साथ हूँ ,परन्तु मै कभी क्रियात्मक रूप में धार्मिक (ढकोसलावादी) नही रहा और न ही बनना चाहता हूँ,समदर्शी भाव सदैव ही हृदय में विद्यमान रहा ,और जहाँ तक बात आत्मनिरिक्छ्न की है तो एक आलोचक की भांति रात को सोने से पहले आत्म मंथन करके खुद के विपथन को दूर करने का असफल प्रयाश करता हूँ ,और जहाँ तक बात कृतज्ञता और अर्पण की है ,(तो जब यह जीवन ही उसी का है उसके प्रवाह को निर्देशित करने का प्रयत्न कर सकता हूँ ,जो मानव रूप में मेरा कर्म है,परन्तु मेरा प्रयत्न सफल होगा या निष्फल यह भी वही जनता है ,(और मेरा यह जीवन जो की सबसे बड़ी वस्तु है उसने मुझे बिना मांगे ही दिया और जब तक उसकी इच्छा रहेगी इस पृथ्वी पर रहूँगा फिर इसके बीच की छोटी छोटी वस्तुओं पर विचार ही क्यों करूं जबकि मै जानता हूँ की जो कुछ घटित हो रहा है उसी की प्रेरणा से मेरे जीवन की हर स्वांस प्रछ्वांस उसी के अधीन है फिर बीच मे (मै)कहाँ हूँ ,प्रारम्भ मै भी वही था , मध्य मे भी वही है ,और अंत मे भी वही रहेगा ,फिर शेष कहाँ बचा जिस पर विचार करूं |  

के द्वारा:

आदरणीय बाजपेई जी ! सादर प्रणाम !! ईश्वर की जिस निकटता में आप पहुँच चुके है मै अभी उसकी कल्पना करने योग्य भी नहीं आप ईश्वर को सनम के रूप में देख रहे है , जिस प्रकार राधा जी ने कृष्ण जी को देखा , सूफी संतों ने खुदा को देखा उसी प्रकार आप भी ईश्वर को देख पा रहे है आध्यात्म की यह उच्च स्थिति है तभी तो आप कह सके :~ १.फिर अहंकार भी अपना कहां है? यह भी तो उसी का है। २.ईश्‍वर दूर कहां है जो हम निकटता के लिए उद्यम करें। ३.हजार की गरज हो तो अपनाना। हम तो तेरे ही थे। तेरे ही हैं और तेरे ही रहेंगे। निश्चय ही यह भाव उसी व्यक्ति के हो सकते है जिसने ईश्वर की निकटता का अनुभव किया हो व् एक उच्च आध्यात्मिक स्तर प्राप्त कर लिया हो यह पोस्ट उन प्यासों के लिए है जो अपने जीवन में ईश्वर की निकटता की कमी महसूस करते है और उसे इधर उधर ढूंढते है मैंने भी उसे बरसों ढूंढा और जिस विधि से उसकी निकटता प्राप्त कर पाया, उसे मित्रों/पाठकों के सामने रख दिया हमें और हमारे मित्रों/पाठकों को आशीर्वाद दें कि हम भी उसके इतना निकट हों कि उसे सनम कह सकें आपको एक बार पुनः प्रणाम !!!

के द्वारा: daniel daniel

"सबसे पहले आप उन बातों की सूची बना लें जिनके कारण आप स्वयं पर गर्व कर सकते है जैसे आप अच्छे गायक हों ए पढाई में अच्छे हों एरूपवान हों ए स्पोर्ट्स में अच्छे हों ए शारीरिक बल में श्रेष्ट्र हों या अन्य कोई भी विशेषता ए जिस पर आप स्वयं पर घमंड करते हों या कर सकते हों ।बस इन्ही विशेषताओं को ईश्वर को अर्पित कर दें ।" डैनियल जी सादर वंदेमातरम ! आपके आध्यात्मिक अनुभवों से पाठक जरूर लाभान्वित हो रहे होंगे । आपका प्रयास बहुत ही सुंदर है । इन अनुभवों से हम सब अपनी अपनी ग्रंथियों से मुक्त हो सकते हैं । गीता में भगवान श्री कृष्ण ने भी यही कहा है कि तुम सिर्फ कर्म करो । फल की चिंता मत करो । कर्म करने के बाद उसका फल मुझे अर्पित कर दो । इस प्रकार तुम फल के बंधनों में नहीं बंधोगे और अंत मंे आवागमन के चक्कर से मुक्त हो जाओगे । बहुत सुंदर पोस्ट । आभार ।

के द्वारा:

आदरणीय शाही जी नमस्कार ! मुझे लगता है कि आपने इस पोस्ट को काफी समय देकर पढ़ा है और उससे भी अधिक समय इस सम्बन्ध में, चिंतन मनन करने में दिया है !! मैं अघोरपंथ के बारे में अधिक तो नहीं जनता , इस विषय में मेरा ज्ञान कुछ पत्रिकाओं विशेष कर कादम्बिनी के लेखों आदि से प्राप्त थोड़ी बहुत जानकारी तक ही सीमित है एक बात ज़रूर है जो हम अघोरियों से सीख सकतें है अघोरी अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए दृढसंकल्प होते है और सांसारिक सुख - सुविधाओं का त्याग कर देते है, लोग उन्हें क्या कहेंगे इस बात की वे कभी कोई परवाह नहीं करते ! अघोरियों का यह भाव ग्रहण करने योग्य है इस भाव का प्रयोग वे अपनी साधना (शक्ति प्राप्त करने) के लिए करते है हम अपनी आध्यात्मिक उन्नति की लिए इस भाव को आत्मसात कर लाभ उठा सकते है !! अब आपकी अगली बात का उत्तर प्रस्तुत करने का प्रयास करता हूँ, अहंकारी होने के लिए ज्ञानवान या बुद्धिमान होना आवश्यक नहीं , एक अज्ञानी या निर्बुद्धि भी अहंकारी हो सकता है अहंकार का मूल भाव अपेक्षाकृत क्ष्रेष्ठ होने का है, इस भाव को सावधानी पूर्वक मन में ला कर उस व्यक्ति को जिसने हमारे विरुद्ध अपराध ( हानि, अपमान , धोखा ,आदि) किया हो क्षमा किया जा सकता है !! यह कार्य आरम्भ में मूर्खतापूर्ण लग सकता है किन्तु लगातार इस विषय में चिंतन/अभ्यास करते करते यह होने लगता है, आरम्भ करें आप निशित ही सफल हो होंगे !!! ***शुभकामनाएं ***

के द्वारा: daniel daniel

डैनियल जी गूढ़ आध्यात्मिक रहस्यों से परिपूर्ण लेख है आपका … बधाई । अहंकार को औषधि भी बनाया जा सकता है, आपका यह विचार वास्तव में रोमांचित करने वाला है । ऐसा लगता है कि अघोरपंथ के अनुयायी कदाचित इसीलिये सांसारिक लोगों को अहंकारी लगते हैं, क्योंकि या तो वे अपने अहंकार को सकारात्मक बनाने की प्रक्रिया में हैं, या फ़िर अहंकार को क्षमाशीलता में कन्वर्ट कर चुके हैं । वैसे थोड़ा और विस्तार से आपको समझाने की आवश्यकता है कि ऐसी सिद्धि के लिये अपने अहं को अधिक ज्ञानी होने का एहसास कराने के लिये क्या किसी गहन अध्ययन की आवश्यकता पड़ेगी, अथवा जो ज्ञान अपने पास है, उसी के आधार पर अपने को अगले से अधिक ज्ञानी समझ लेना चाहिये । साधुवाद ।

के द्वारा:

रौशनी जी ! क्षमा सदैव ह्रदय से ही होनी चाहिए जीभ से क्षमा करने का आध्यात्मिक उन्नति में कोई लाभ नहीं ! आपका यह कहना सच है कि क्षमा करना इतना आसान नहीं होता आपको सुझाव देना चाहूँगा कि जिस किसी को आप क्षमा नहीं कर पा रही हों, उसके विषय में विचार करें कि वह एक बंदी के सामान है जिसे जंजीरों में बांध कर रखा गया है और यह जंजीरें है ईर्ष्या ,डाह , परनिंदा , लालच , घृणा , परपीड़ा सुख ! यह भी विचार करें कि वह ईश्वर के वरदानों से वंचित , संसारिकता के बंधनों में पूरी तरह जकड़ा हुआ है और आपके पास है इश्वर का प्रेम , उसकी कृपा और उसकी दी हुई बुद्धि और इन सब से बढ़कर आत्मिक आनंद व् स्वर्गीय शांति जो सारी समझ से परे है इसके अलावा इश्वर का दिया हुआ क्षमा करने का अधिकार भी आपके पास है यदि आपने उसे क्षमा कर दिया तो इश्वर भी उसे क्षमा कर देंगे ! क्षमा का भाव लाने के बाद उसके लिए इश्वर से प्रार्थना करना बहुत ही ज़रूरी है कि इश्वर उसे सदबुद्धि दें कि वह बुराई/पाप की जंजीरों से मुक्त हो सके !! ..........................प्रश्नों का स्वागत है ......................

के द्वारा: daniel daniel

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